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बस यूँ ही मुस्कुराने को जी चाहता है

बस यूँ ही मुस्कुराने को जी चाहता है

बस यूँ ही मुस्कुराने को जी चाहता है।
ना जाने क्या हो गया है मुझे आज,
कभी होतीं हूँ ख़फ़ा खुद से,
तो क़भी होता है खुद पे नाज़।
न है कल की फिकर, न कोई डर
इन सारे पलों को समेट लेने को जी चाहता है।।
नहीं जानती कि कल मेरे लिए क्या लायेगा?
वो मेरा होगा या मुझसे खफ़ा होगा,
बस सारे बन्धन तोड़कर उड़ जाने को जी चाहता है।।
कितने मासूम थे वो दिन,
जब हम हँसते थे फ़िकर के बिन,
वो चॉकलेट्स ना मिलने पर रोना,
और माँ के आंचल में छिप कर सोना,
आज फिर छोटी छोटी बातों पे रोने को जी चाहता है।।
ना फ़िकर, ना कोई ग़म था,
समझदारी से अंजान वो बचपन कितना हसीन था।
बस उसी बचपन मे आज लौट जाने को जी चाहता है।।
रोज़मर्रा की जद्दोजहत में हम कहीं खो जाते हैं,
छोटी-छोटी खुशियाँ स्ट्रेस के नीचे कहीं दफ़न हो जातीं हैं
इन छोटी-छोटी खुशियों को समेट लेने को जी चाहता है।।
बहुत सुन ली औरों की,
क़भी-क़भी अपने पर भी अपनी चलाने को जी चाहता है।।
क्यूँ मैं सोचूँ क्या ग़लत है क्या सही?
जो दिल मेरा करे, क्यूँ ना करूँ मैं वही,
कभी-कभी जानबूझकर भी गलतियाँ करने को जी चाहता है।।
मैं लिख क्या रहीं हूँ नहीं जानती,
और आज कुछ सोचना भी नहीं चाहती,
आज बस यूँही लिखे जाने को जी चाहता है।।
नहीं सोचना चाहती कुछ और अब,
जो जी में आये वही करने को जी चाहता है।।
नादान नहीं हूं मैं,
पर कभी-कभी नादानियाँ करने को जी चाहता है।।
ना हो कोई ग़म, ना ही कोई आरज़ू,
ना हो कोई सितम, ना कोई ज़ुस्तज़ू,
बस यूँ ही जिए जाने को जी चाहता है।
बस यूँ ही जिए जाने को जी चाहता है।।
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