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कुछ नहीं पर बहुत कुछ

कुछ नहीं पर बहुत कुछ

तुम पूछती "क्या बनाऊँ टिफिन के लिए?"
मैं कहती "कुछ भी"
घर आने पर तुम पूछती "खाना लगा दूँ?"
मैं कहती  "थोड़ी देर में"
गले लगने पर तुम पूछती "क्या हुआ?"
मैं कहती "कुछ नहीं"
तुम्हारे हर सवाल का जवाब मैंने अटपटा ही दिया,
फिर भी लंच बॉक्स में हमेशा
खाना अपनी पसंद का ही पाया,
यूँ तो खाने को लेकर नखरे हमेशा रहे मेरे
पर मेरे "कुछ नहीं", "कुछ भी", " ये नहीं", "फिर वही" को
तुमने हमेशा मेरी पसंद बना कर परोसा,
मेरी भूख का रिश्ता मेरे पेट से ज्यादा तुम्हारे दिल से रहा..
मेरे "अभी नहीं", "थोड़ी देर में" और "बाद में" का हिसाब तुम बखूबी कैसे लगा लेती हो माँ?
मेरे " कुछ नहीं" में भी "बहुत कुछ" तुम कैसे निकाल लेती हो माँ?"
कभी मेरे इन अटपटे जवाबो का मर्म, 
कोई और कुछ समझ पाएगा क्या ?
शायद कोई नहीं!
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