Custom Pages
[vc_separator type='transparent' color='' thickness='' up='20' down='7']
Portfolio
[vc_separator type='transparent' color='' thickness='' up='20' down='7'] [vc_separator type="transparent" position="center" up="12" down="16"]
Share on facebook
Share on twitter
Share on whatsapp
जीवन की कठिनाई से,
समाज की एक घिनौनी सच्चाई से,
हार गयी बुराई से,
निकल पड़ी वो ना जाने किस मोड़ पर।
सारी ज़िम्मेदारियों को छोड़कर,
भागी-भागी-सी दौड़ रही थी,
जैसे किसी काले धब्बे से पीछा छुड़ा रही थी।
अचानक से उसके भागते कदम रुक पड़े,
पूर्णमासी की रात में,
विशाल श्रृंगीयों के बीच में,
झलकते सितारों के प्रतिबिम्ब शाँत तरंगिणी की पय में,
दूर्वा, कुश के बीच में।
अपना हाँफता शरीर लिए,
मंद-मंद बहती समीर में,
चकाचौंध खड़ी थी वो,
जीवन से हताश होकर स्थिर पड़ी थी वो।
पहर का कोई ख्याल न था,
अचानक ही जोर-जोर से चीखने लगी वो,
पर्वतों, वृक्षों वहाँ मौजूद सभी प्राकृतिक मित्रों को,
अपने जीवन की एक भयानक अनिष्ट कहानी,
बिलख-बिलख कर,
सुनाने लगी वो…
इसकी सिर्फ इतनी गलती थी, कि
किसी शख्स से सच्चा प्रेम किया इसने,
इसके प्रेम को शख्स समझा नहीं और,
स्त्री को पूरी तरह से समर्पित करने को कहा उस शख्स ने।
प्रेम की आड़ में वो स्त्री का इस्तेमाल करता रहा,
झूठे सपने विवाह का दिखाता रहा।
एक पति-सा अधिकार
स्त्री पर जताता रहा।
आज ज़ब वो माँ बनने वाली है,
तो प्रेमी इस बात से इंकार कर रहा,
चार समाज के सामने उसे बदनाम कर
खुद को शरीफ बता रहा।
नहीं तैयार आज वो शख्स,
स्त्री की बात मानने को,
आखिर क्यूँ उस स्त्री पर लांछन लगा रहा,
किसी और का पाप बता रहा, खुद की झूठी प्रेम की निशानी को।
पहले खुद उकसाया उस शख्स ने,
और आज तैयार नहीं वो स्त्री को अपनाने को,
क्यूँ सारी की सारी गलतियाँ दिख रहीं उस स्त्री में,
इस जमाने को।
बहुत पश्चाताप हो रहा स्त्री को,
निकल गयी सब कुछ छोड़कर वो,
माता-पिता से नज़रे वो मिला ना सकेगी,
इतनी बड़ी गलती के लिए खुद को माफ़ कर ना सकेगी।
इसके प्रेमी ने,
स्त्री को बहुत बड़ा धोखा दिया,
कोस रही है खुद को कि,
आखिर क्यूँ इसने उसे मौका दिया।
क्या मुँह दिखाएगी अब वो ज़माने को,
कैसे बर्दास्त करेगी स्त्री
दुनिया के ताने को।
शायद उसने फैसला लिया अपने प्राण त्यागने को,
यकीन उसे हो गया
कोई नहीं मिलेगा अब उसे समझने को।
ऐसी आप बीती वो बता रही है,
अपने सारे प्रश्नों का जवाब,
रो-रो कर सबसे माँग रही।
स्त्री ने सोच लिया,
खुद को हमेशा कि लिए मिटाने को।
था पीछे दो वृक्ष स्थिर खड़ा,
अब खुद को अस्थिर करने की कोशिश कर रहे हैं,
सुनकर उसकी ऐसी पीड़ा।
कहीं ये निर्दोष स्त्री खुद के साथ कुछ गलत ना कर ले,
वो भी शायद डर रहे हैं।
पास आकर स्त्री को ये
खुद सीने से लगाना चाहते हैं,
इस तरह से निराश मत हो तुम,
वृक्ष उसे समझाना - संभालना चाहते हैं।
सहसा उसकी नज़र चाँद पर पड़ी,
शायद वो दर्पण-सा नज़र आ रहा था,
स्त्री के खुद को कमजोर ना करे,
वो भी यही समझा रहा था।
चाँद रूपी दर्पण में एक सितारा झलक रहा है,
जिसकी चमक स्त्री के भविष्य को दर्शा रहा है।
मंद पवन, मन में स्त्री के बहुत से हौसले भर रहा है।
ये चाँद जैसे की स्त्री से बहुत कुछ कह रहा है,
लड़ लो इस समाज से तुम,
उस शख्स से अपना अधिकार माँगो,
दुनिया में खुद को सही साबित करो,
और जीवन में फिर से संघर्ष करो,
हे स्त्री निराश होकर इस घटनाओं से,
तुम इस तरह से टूटकर मत बिखरो…
0

Note : Please Login to use like button

Share this post with your friends

Share on facebook
Share on twitter
Share on whatsapp
Share on email
No Comments

Post A Comment

Related Posts

Broken Heart
Soma Mukherjee

Typewriter with a story: Dad

A typewriter lay in the corner,Reminding of old thoughts and yonder,It had memories,Of old or golden stories.I knew my dad used those,To type letters or prose,He wrote love letters to my mother,And stories to reporters.It lay in the dustAnd had got rust.After my dad’s death,His

Read More »
Broken Heart
Soma Mukherjee

Dear Dad: Letter in heaven

Dear Dad,I am sad.As father’s day is on the cornerBut you are nowhere.I hope angels in the heavens,With their brethren,Are giving you love and care.Fulfilling needs and desires.I remember your upbringing,It was strict and so was your scolding.It made me different than the rest,It made

Read More »
Article
Soma Mukherjee

She came in the dark

I used to work with a lady called Rina. We are both Pisceans so we bonded over common things and pangs of being soft, sensitive, loving Pisceans.She quit her job but we were in touch. She was unmarried,35 with a large family of 5 sisters.

Read More »
Consciousness
Soma Mukherjee

Together we will win

Life in a pandemic is tough,life is certainly rough.Every day or nightLife is something to fight.The world seems lonely and not the same,Survivors are fittest in the game.Fight for Food or Oxygen every day,Condolences or words are not enough to say. Be nice,loving and kindBe

Read More »