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मुहब्बत

मुहब्बत

इन कांँटों को मुझे इस तरह तेरी राह से हटाना है
मोहब्बत कितनी है तुझसे ये बे-साख़्ता बताना है
तेरी ज़रूरत है मुझे, हो जैसे जीने को साँसें ज़रूरी
हुई आदत ऐसी तेरी,जो चाहकर भी ना छुड़ाना है
तेरी ख़ुशबू मुझे घेरे रहती है हर वक़्त तेरे चार–सूँ
तेरा हाथ पकड़ चलूंँ तो ये मौसम होता सुहाना है
दस्तगीर कर अपना मुझे, चूमने दे अपने हाथों को
दो मंजूरी मुस्का कर, हमें दिल-से-दिल मिलाना है
तुम मानिंद-ए-कोहिनूर हो, लड़ने को तैयार हैं सब
मोहब्बत में शिकस्त-ख़ुर्दा हुए, तुझे ही जिताना है
दूसरी निगाह के देखने से,अदावत करता है ये दिल
करूँ यूँ हिफ़ाज़त, ऐसे तुझे इस रूह में छिपाना है।
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