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दोस्ती

दोस्ती

वो स्कूल में हम गलतियाँ कर के इल्ज़ाम दूसरों पर लगा दिया करते थे,
थोड़ा-थोड़ा बोलकर हम अपनी फीमेल दोस्तों का सारा टिफ़िन खाली कर दिया करते थे,
वो हम पर चिल्लाती थीं गुस्सा करती थीं,
हम तब अनजान थे और अपनी गलतियों पर भी हँसते रहते थे।
वो दिन भी क्या दिन थे,
वो दिन भी क्या दिन थे।
स्कूल जाने के डर से घर वालों की नज़रो में बीमार हो जाया करते थे,
और फिर थोड़ी देर बाद छत पर जाकर पतंग उड़ाया करते थे,
और फिर पापा को देखकर बीमार होने का ढोंग किया करते थे।
वो दिन भी क्या दिन थे,
वो दिन भी क्या दिन थे।
फिर कॉलेज में कुछ और नए हरामी दोस्त मिले,
उन जैसे दोस्त तो क्या, भगवान दुश्मन भी किसी को ना मिले,
वो साले सिर्फ दिखने में ही शरीफ लगा करते थे,
दोस्त बोलकर खुद को दुश्मनों जैसा दिखाया करते थे।
वो दिन भी क्या दिन थे,
वो दिन भी क्या दिन थे।
जब हर महीने घर से पैसे आया करते थे,
दारू चिकन माँगकर पूरा जश्न मनाया करते थे,
और पीने के बाद बाहर घूमते पुलिस वालों से उलझ जाया करते थे,
कोई पूछे जब हमसे हमारे पापा का काम तो हम खुद को मंत्री का बेटा बताया करते थे।
वो दिन भी क्या दिन थे,
वो दिन भी क्या दिन थे।
रोज़ शाम को सारे दोस्त तैयार हो कर गली के चौक पर जाकर बैठ जाया करते थे,
और आती जाती लड़कियों को देख सब हरामी दोस्त उन्हें ताड़ा करते थे,
लड़कियों से बात किये बिना,
दोस्तों को भाभी है तुम्हारी ऐसा कहा करते थे।
वो दिन भी क्या दिन थे,
वो दिन भी क्या दिन थे।
कॉलज की फीस देकर कमरे का किराया देकर जो बचता था उन पैसों से कहीं बाहर घूमने फिरने की तैयारी किया करते थे,
और जैसे-जैसे महीना खत्म होता था फिर दूसरों के आगे हाथ फैलाया करते थे,
और कभी-कभी तो भंडारे में जाकर भी पेट भर लिया करते थे।
वो दिन भी क्या दिन थे,
वो दिन भी क्या दिन थे।
पर वो साले हरामी मेरे दोस्त ना मिलते तो वो यादें वो किस्से यादगार कभी बनते ही नहीं,
हर मुसीबत में साथ निभाया रोते हुए को उन सालों ने हँसना सिखाया,
कभी भूल ही नहीं पाऊँगा उन लम्हों को उन यादों को,
जिसमें शुमार मेरे साथी मेरे हमराही जिगरी यार शामिल थे।
सच में यारों,
वो दिन भी क्या दिन थे,
वो दिन भी क्या दिन थे।
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