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अब तक का सफ़र

अब तक का सफ़र

मुस्तक़बिल की चाह में,
होठों पर ऊँगली लगाए ख़ामोश हो गए,
क़दम क़दम बढ़ाए राहों में,
हाथों में हाथ थमाए आग़ोश में आ गए।
अब तक का सफ़र कभी कश्ती सा था,
तो कभी स्थिर पानी में बीच दरिया में रुका सा,
शायद सोच से शुरू हुआ किस्सा हमारा,
औऱ समझ की दीवार बनाए मदहोश हो गए।
रास्ता थोड़ा सुना था मेरा,
इसलिए तन्हाई में सफ़र गुजर गया,
अनजान सफ़र पर निकले थे हम,
अपनों ने दामन छोड़ा,
ग़ैरों के सहारे वो अनदेखा मंज़िल भी दिख गया।
कैसे किसी के इंतेज़ार में ठहरे रहें हम,
कहीं इंतेज़ार में ही कहानी अधूरा रह गया।
अब तक का सफ़र कहीं गुमनाम था,
कोशिश हर संभव थी फ़िर ना जानें क्यों,
अपनी नज़रों में मशहूर औऱ दूसरों की
आँखो से अंजान पैग़ाम था।
अब तक का सफ़र कभी सर्द के
सुबह की कुहासे में छिपी हुई थी,
तो कभी शाम के गोधूलि की धुँध में बिखरी हुई थी।
अब तक का सफ़र कहीं बाढ़ के पानी
सा उम्मीद से ज्यादा तो कहीं,
सूखा सा पानी को देखने से भी दूभर था।
शायद अब तक का सफ़र ज़िन्दगी का
वो हिस्सा था जिसे सिर्फ़ भुलाने के
लिए हमनें ज़िन्दगी को एक मौक़ा दिया था।
शायद इसलिए कहते है,
जीवन का ये कैसा सफ़र रहा,
कभी काटों में ग़ुलाब जन्म लेता रहा,
तो कभी कीचड़ में कमल खिलता रहा।
मुक़म्मल अब तक का सफ़र वही हुआ,
जिसमें एक क़दम ने दूसरे क़दम को
भरोसे से मंज़िल का लालच दिखाता रहा।
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