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अब तक का सफ़र

अब तक का सफ़र

नज़्म-ऐ-हयात के साथ हमारे सफ़र ने,
पूरे कर लिए दो शतक।
सफ़र इतना सुहाना था,
कि पता ही नहीं चला,
लगा मानो कल ही की बात है।
घूमते रहते थे चुनौती के इर्द-गिर्द ही,
हमारे विचार व जज़्बात, दिन रात।

बहुत मधुर स्मृतियाँ जुड़ी हैं,
अब तक के सफ़र के साथ।
नित नई चुनौती, नया शीर्षक,
हर रोज़ ही शुरू हो जाता था,
एक नया सफ़र और रच देता था,
एक नया इतिहास।


सुबह उठते ही सबसे पहले ,
देखना चुनौती का विषय और
चलना मस्तिष्क में उसी का विचार मंथन अतिशय,
उन मानसिक उद्वेगों को,
शब्दों में ढालकर ,
कविता का रूप देना बहुत भाता था।

और जब कोई पहचान मिलती थी अपनी रचना को,
तो मन बहुत मुस्काता था।

फिर धीरे-धीरे शुरू हुई ,
चार पंक्तियों की प्रतियोगिता,
अर्थात गागर में सागर भरने की योग्यता।
क्या लिखें क्या छोड़ें,
इसी कशमकश में रह जाते थे ,
फिर भी कोशिश करके चार पंक्तियों की कविता बनाते थे।

फिर साप्ताहिक रविवार की चुनौती, अपने मन से ही कुछ भी लिखने की ।
इसमें तो और भी मन लगता था,
भावनाओं का अतिरेक ना थमता था।

अपना हृदय खोल कर रख देते थे,
और एडमिन भी सबको प्रमाण पत्र दे देते थे।

इस सफर की अगली कड़ी भी,
थी बहुत दिलचस्प।
तस्वीर को देखकर ,
अपने मन के भावों को प्रकट करने का विकल्प।

इस सफर में हमें,
विषयों की भी मिली विविधता।
देश व काल के अनुसार,
विषय बदलते गए,
और हमारी कल्पना के भाव भी,
पंख लगाकर उड़ते गए।

उन नित नई चुनौतियों का ,
सामना करना हमें दिन-ब-दिन भाता गया,
और उसमें भी एक अलग तरह का आनंद आता गया।

आरंभ से लेकर अब तक के सफ़र में ,
प्रथम दिवस वाला उत्साह व उत्तेजना में,
हम रहे तर-ब-तर,
और आशा है भविष्य में भी ऐसे ही,
हंसते- खेलते ,लिखते- पढ़ते और गुनगुनाते हुए कट जाएगा हमारा यह सफ़र।
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