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न कोई ख़त न कोई पैग़ाम

न कोई ख़त न कोई पैग़ाम

न कोई ख़त न कोई पैग़ाम,
क्या वफ़ाई का यहीं होता है अंजाम?
दोषी तो वो प्यार करने वाला है,
पर हम पे लगा है बेकसूर इल्जाम।

क्या तुम्हें याद नहीं आती,
या फिर तुम याद नहीं करतीं,
पहले दुआओं से उम्र बढ़ाती थी,
पर अब तो तुम बात भी नहीं करतीं ‌।

यह कोनसा समां है,
जिसने तुम्हें इतना बदल दिया,
या फिर किसी आशिक ने,
आंसू पोंछने के लिए अपना आंचल दे दिया।

वक्त से लड़ाई है?
या फिर रुलाई है?
जल्दी बताकर मिटादे इन्हें,
यह ख़तरनाक दूरीयों की खा़ई है।

बस इसे कोई जबरदस्ती मत समझना,
दिल की एक अधूरी ख्वाहिश का सब़र कर रहा हूँ,
जो शिद्दत से मोहब्बत की थी,
उसका अब तेरे यादों से ज़िक्र कर रहा हूँ।
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