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संगीत का प्रभाव

संगीत का प्रभाव

शक्तियों में अनुपम संगीत होता है,
सात सुरों के संगम का साथ होता है,
सिर्फ़ संगीत के कानों तक पहुँचने से
दिल को चैन , मन को सुकून
और सारे तनाव से मुक्ति का निकास होता है।
संगीत का प्रभाव कहाँ कुछ
दिनों से चला आ रहा है,
ये तो ना जाने कितने युगों से
हर इंसान में जीवित रहा है।

कभी कृष्ण की बाँसुरी की
धुन से गोपी गोपियाँ मग्न हो जाती थी,
तो कभी उसी बाँसुरी की आवाज़ से
गाय बछड़े मंत्रमुग्ध होकर दौङे चले आते थे।
कहीं तानसेन के दीपक राग के प्रभाव से

बुझे दिये जल उठते थे।
तो कभी मेघ मल्हार राग से
बेमौसम बरसात होने लगती थी।
कहते हैं,
तानसेन के संगीत का प्रभाव तो
इस क़दर था कि पत्थर भी पानी बन जाता था।

काम कौतुकी की वीणा पर
उंगलियाँ फेरते ही ठंडी ठंडी हवाएँ चलने लगतीं थीं।
शायद संगीत का प्रभाव ही ऐसा है कि
बेज़ान साज में भी जान आ जाती है।
ज़िन्दगी में गीत के रंग ना हो
तो ये ज़िन्दगी भी बिना सुर के
नीरस सी लगने लगती है।

सरगम के राग के बिना,
मन का आंगन सुना सा लगता है।
संगीत का प्रभाव हमारे प्रकृति

में भी हर औऱ व्याप्त है।
नदियों के कल कल में,

पेड़ों की हवाओं में,
सावन की रिमझिम बारिश में,
शरीर की धड़कन और सांसों में।
संगीत के बिना जीवन तो है,

पर इसके प्रभाव बिना
हर उत्सव में गहरा सा अभाव लगता है।
संगीत के प्रभाव मात्र से,
मन में निर्मित विकार दूर हो जाते हैं।

संगीत से तो शरीर के ना जानें
कितने अदृश्य रोग नष्ट हो जाते हैं।

कभी किसी के आने की ख़ुशी में,
तो कभी किसी के जाने के ग़म में,
कभी किसी की शादी में,
तो कभी किसी के बर्बादी में,
ये संगीत का प्रभाव ही है,
जो जीवन के हर पहलू में
इंसान को जीने का अनोखा ढंग सीखा जाते हैं।
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