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खुदगर्ज़ कौन?

खुदगर्ज़ कौन?

कभी सुना था खुदगर्जी किस्सों में,
आज ख़ुद शिकार हुआ,
और बिखर चुका हूँ हिस्सों में।
करती रही वो हमे ग़ुमराह,
हम उसे प्यार ही हद समझ रहे थे,
दिल लगाने की आदत थी मेरी,
शायद इसी बात की क़ीमत अदा कर रहे थे।
झूठी दिलासा दे रही थी वो हमें,
ज़िन्दगी की आशा उसमे हम देख रहे थे,
बेहिचक शर्मशार करती रही वो हमें,
जान अपनी उसके क़दमो में सौंप दे रहे थे।
सूखे कुएँ सी थीं वो मुझमें,
मानते रहे सागर का दरिया उन्हें,
हर पल हर लम्हा बर्बाद किया उनपर,
खुदगर्ज़ हम थे या खुदगर्ज़ कहें उन्हें।
कैसे कहें खुदगर्ज़ उनकों,
ख़ातिर जिनके हर फ़र्ज़ निभा बैठे,
शायद कमीं हमारे संग में ही होंगी,
इसलिए उनमें ही अपना अर्ज समझ बैठे।
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