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दो प्रेमी,एक प्रेम

दो प्रेमी,एक प्रेम

कल शाम जब सूरज को
ढ़लते देखा मैंने,
एक नाक़ाम कोशिश की
टीस महसूस की थी मैंने।
वो लाल रंग आकाश का,
वो डूबती किरणों के अवकाश का,
वो साथ छूटने के विश्वास का,
हर नज़र आने वाली चीज़
मुझे तुमसे जुदा करने की कोशिश करते देखा था मैंने।
पर इस श्यामली सांझ को
उस पेड़ की छांव तले,
एक गहराती हुई प्रेम कहानी को पन्नों पर
लिख़ने के बजाय प्रकृति में समर्पित होते देखा था मैंने।
शायद शब्दों के नाज़ुक रूप उसे समेट ना पाएँ,
शायद लफ़्ज़ो के अनमोल बोल भी बयां ना कर पाएँ।
नदियों में हंसो के जोड़े जैसे निर्मित,
आसमान में कबूतरों जैसे फड़फड़ाते,
पंखों में आँखो को एक दूजे में समाए,
चाँद की चाँदनी भी जिसे निहारने को,
शायद आज जल्दी हैं दिन में निकलने को।
दो प्रेमी हैं वो,
जिसे समाज के कुरूपता से दूर होकर,
संसार के सांसारिक मोह से अलग होकर,
देह के अकुलाहट से तृप्त होकर,
शायद एक प्रेम में दो प्रेमी को,
आधा आधा मानकर सम्पूर्ण होते देखा था मैंने।
वो बस एक मिलन नहीं देखा था मैंने,
एक प्रेम में दो प्रेमी का मिलन था वो,
रात के अँधेरे से सुबह के दूधिया रौशनी का मिलना,
दो जीवित सायों का एक शरीर से जुड़ना,
बेज़ान धरती का जानलेवा सूरज से मिलना,
कुछ पलों का क्षणिक मिलन था वो,
आनंद हैं उस मिलन का जितना
जैसे प्यासे को एक बूँद की प्यास हो,
पतझड़ में कोपलें खिलने की आस हो,
सूखी मिट्टी में फ़सल का विश्वास हो,
अपनों में भी सबसे खासमखास हो,
ज़िन्दगी का हर पल एक जनम के समान
लगता देखा था मैंने,
जब मिलन के उस बेला में अपनी आँखों
से दो प्रेमी को एक प्रेम में बंधते देखा था मैंने।
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