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तुम मुझसे माफ़ी न माँगो

तुम मुझसे माफ़ी न माँगो

सुनो,
आज तुम चैन से चले जाओ,
बस थोड़ी देर ठहरकर।
अब्र का चाँद तो रोज़ निकलेगा,
पर तुम कल से न मिलोगी हमें।

न, न,
तुम मुझसे माफ़ी न माँगो।
न, प्यार के बदले में प्यार ना करना, कोई गुनाह नहीं।
और एक तरफ़ा प्यार करना भी गुनाह नहीं।
हम दोनों ही गुनहगार नहीं।
वक्त का तक़ाज़ा है सारा,
मुक़द्दरों का खेल।
मुक़्क़दर से बड़ा तो क़तई कोई हुआ नहीं।
मेरा अधुरापन कर देता है कामिल ‘हमें’
वो ‘हम’ जो मेरे ज़हन में है।
वँही तो है सारी महफ़िलें,
वँही तो है सारी अदालतें,
वँही तो हारा हूँ मैं मुक्कदमा दिल का।
मगर न, अगरचे होना है किसी को शर्मिंदा,
गर है कोई कमी हालात ए तव्वाज़ुन में,
तो उसका मेहरबान है वो,
वो जिसने लिखा है हिसाब अपना,
जो कहता है खुद को खुदा।
इसलिए सुनो,
तुम मुझसे माफ़ी न माँगो।
मोहब्बत के बदले में मोहब्बत मिले ये जरूरी तो नहीं।
ये जज़्बात है कोई सौदा थोड़ी है, सनम।
मैं गर हार जाऊँ, टूट जाऊँ कभी,
इसे तन्हा निभाते,
न मरूँगा नहीं,
हैं ज़िम्मेदारियाँ बहुत।
तुम्हारे साथ लिखे कुछ अल्फ़ाज़ पढ़ लूँगा,
कुछ लिख लूँगा अश्क़ अपने एहसास में डुबोकर।
वैसे रूह तो लफ़्ज़ों की भी मोहताज़ नहीं।
ये पाकिज़गी सनम तेरे सदके करता हूँ,
हाँ मैं तुमसे इश्क आज भी करता हूँ।
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