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अलविदा राहत साहब

अलविदा राहत साहब

अलविदा राहत साहब कहता है ज़माना,
मगर हमने माना नहीं।
उठा आपका जनाज़ा,
मगर हम आपसे जुदा हुए नहीं।
बिलखते आँसू रुकते नहीं,
और हमने आप चले गए हो दूर ये माना नहीं।
कहता है ज़माना शायरी का एक दौर गुज़र गया,
मगर सच में लगता है मानो शायरी ही इस दुनिया से जुदा हो गई है।
एक अरसा गुज़र गया,
आपकी आवाज़ सुने हुए।
मगर अब तो आपकी आवाज़ दिल में बस गई है,
आपकी आवाज़ सुन दिल छलनी हो जाता है और बस आपकी यादों में खो जाता है।
काश जैसे हँसकर हर मुश्किल को धूल चटाई,
उसी तरह खुदा का ये फ़रमान भी ठुकरा देते।
काश आप हमें छोड़कर न जातें,
काश आपकी सोहबत कुछ और पल नसीब हो जातें।
अलविदा राहत साहब, आप हमारे दिलों में धड़कन बन सदा धड़कते रहेंगें।
आप बहुत याद आओगे और हम जब भी शायरी करेंगे हर बार एक दुआ आपकी आत्मा की शांति हेतु करेंगे।
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