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रुला कर चले गए

रुला कर चले गए

अल्फ़ाज़ो की जादूगरी दिखा कर चले गए,
सारे जहाँ को सच में , रूला कर चले गए।
सच बोलना हमेशा,सर चाहे हो कलम,
राहत ये बात जग को,बता कर चले गए।
आतें हैं ऐसे शायर जहाँ में कभी-कभी,
डंका वो शायरी का, बजा कर चले गए।
राहत इंदौरी साहब, सब के दिलों में हैं,
महफिल में रंग भरके, हंसा कर चले गए।
उनकी लिखी ग़ज़ल को पढ़ते रहेंगे हम,
वतन से प्रेम करना, सिखा कर चले गए।
'नसीब' कोई उनको, कैसे भुलाएगा,
नफरत का सब चिराग बुझा कर चले गए।
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