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अचानक बदलाव-महामारी से

अचानक बदलाव-महामारी से

खबरें कोरोना की आयी,
तो मज़ाक बना दिया था हमने,
किसने सोचा था,न दिखने वाला ये,
न जाने कितनों के आँखों से छीन लेगा सपने।
इक्का दुक्का तक पहुँचा था,
असावधानी ने मौक़ा दिया,
अब हर घर को जकड़ रहा है,
बचने का एक ही उपाय मिला था,
सरकार ने सबको घर में बन्द रहने का औजार दिया।
घरों में सबने ख़ुद को क़ैद किया है,
भीड़ वाली दुनियाँ से अपनों को आज़ाद किया है,
कल तक बेख़ौफ़ हाथों में हाथ डाल सैर कर रहे थे,
आज एक दूसरे को छूने को भी ख़ुद का ख़ैर कर रहें हैं।
कहते हैं सभी,
चलो घर बैठे रिश्ते निभाते हैं,
पुराने रिश्तों को नया समझ अपनाते हैं,
ये महामारी आज है,कल चली जाएगी,
ये हमारा रिश्ता ही है जिसे हम अटूट बनाते हैं।
ना किसी का दफ्तर जाना,
ना किसी का स्कूल जाना,
ना अपनों का घर को देर से आना,
खाने की मेज़ पर किसी का इंतेज़ार ना करना,
घड़ी की टिक टिक को नज़र अंदाज़ रखना,
हर पुरानी यादों का पिटारा खोलकर निहारना,
इस लॉकडाउन में हर लम्हें को अपनी झोली में समेट लेना है।
कुछ अनचाही खबरों से भी सामना हुआ,
कहीं मज़दूरों की बेबसी,
तो कहीं सितारों का दुनिया से जाना हुआ,
कहीं जानवरों पर क्रूरता,
तो कहीं इंसानों के संग जानवरों सा व्यवहार हुआ,
महामारी कहाँ किसी की सुनती है,
रोग भले ही महीनों पुराना हुआ,
लेकिन दुनिया में रोगी हर रोज नए हुए।
सरकार ने पूरी कोशिश की और कर रही है,
नियम रोज नए बने और पुराने टूट रहे हैं,
समय का चक्र देखो इस महामारी में,
इंसान जीने की कोशिश में हर रोज मर रहें हैं।⁩
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