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अचानक सा एक बदलाव

अचानक सा एक बदलाव

संसार यूँ बदल गया है जैसे कि नया है।
इस लॉकडाउन में सबकुछ थम गया है।
असर इसका दिन-बा-दिन बढ़ रहा है।
सभी को घर में ही क़ैद रहना पड़ रहा है।
ज़िन्दगी मौत से लड़ती ही जा रही है।
मरीजों की तादात बढ़ती ही जा रही है।
ज़िन्दगी जीने का ढंग बदलता जा रहा है।
जैसा भी है हमें बहुत कुछ सीखा रहा है।
घर में अब तो सभी साथ दिखने लगे है।
मगर दूर-दूर बैठ ज़िन्दगी लिखने लगे हैं।
रामायण, महाभारत फिर दिखने लगा है।
दूरदर्शन फिर से सभी को भाने लगा है।
दादा-दादी के साथ वक़्त बिताने लगे हैं।
नाना-नानी के संग फिर मुस्कुराने लगे हैं।
पशु पक्षी भी अब बिना डर के जीने लगे हैं।
धरती और आकाश भी अब संभलने लगे हैं।
लॉकडाउन में भी कोरोना फैला रहे हैं।
कुछ सरफ़िरे हैं जो बाज़ नहीं आ रहे हैं।
कहीं-कहीं लोग पुलिस से ही लड़ रहे हैं।
कहीं डॉक्टर को पथराव झेलने पड़ रहे हैं।
डॉक्टर और पुलिस जान को बचा रहे हैं।
सफ़ाई कर्मचारी भी हिम्मत दिखा रहे हैं।
हम सबको तो बस इतना ही करना है।
ख़ुदको बचाना है तो कोरोना से डरना है।
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