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मेरे भारत पर अत्याचार

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मेरे देश पर अत्याचार की कहानी,
एक बार सुन लो मेरी जुबानी।
आए थे गोरे व्यवसाय करने,
हमने किया ख़ूब आदर सत्कार।
ऐसी क्या कमी लगी हमारे प्यार में,
किया हम पर सालों तक अत्याचार।
लफ्ज़ कम पड़ गए देख कर,
उनका यह हिंसक अवतार।
क्षति पहुंची मन मस्तिष्क को,
आखिर था यह घातक वार।
सुखचैन सब उजड़ उजड़ गया,
हृदय ग्लानि-ग्लानि हो पड़ा।
फूट डाल और राज कर कि इस कूटनीति में,
मेरे सुनहरे भारत में अंधेरा हो गया।
मिर्च-मसाले खरीदकर गोरों ने क्या मक्खन लगा दिया,
हँसते-खेलते मेरे भारत पर न जाने कब ग्रहण लाग दिया।
नन्ही-नन्ही किलकारियों से लेकर बड़े-बुज़ुर्गों को रुला दिया,
मीठी-मीठी बातें करके मेरे भारत को हथिया लिया।
सैकड़ो वर्षों तक हम राजा-प्रजा को ख़ूब प्रताड़ित किया,
इन गोरों ने मेरे भारत को हर जगह बदनाम किया।
मर-झगड़ कर अंगिनत बलिदान देकर मेरे देश में सवेरा हुआ,
इतना अत्याचार सहने के बाद मेरा भारत स्वतंत्र हुआ।
यह थी मेरे देश पर अत्याचार की कहानी,
यहीं है हम सबकी ज़ुबानी।
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