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गुलज़ार

गुलज़ार

पता कहाँ था कि,
एक मुलाकात में ज़िन्दगी,
हमारी तार तार हो जाएगी।
दिन इतना बेरहम और,
शाम साथ से मुस्कुराएगी।

हारती जो कोशिशें कहूँ या,
जीत को इंतज़ार तेरा था।
हाथ जो थामा तूने मेरा ,
ज़िन्दगी मेरी मुस्कुराएगी।

बन मेरी सुबह तू इस कदर,
बिखर गया मेरी सांसो में,
की हर सांस में हमसफ़र,
हमराही,याद तेरी आएगी।

मेरी हर बात तुझपे खत्म हो,
तुझसे ही शुरुवात हो जाएगी।
कि मोहब्बत होगी मुझे भी,
और ज़िन्दगी संवर जाएगी।
अरे पता कहाँ था कि,
कोई होगा जो समेटेगा,
सुलझाएगा उलझन मेरी भी।
ऋचा बिखरी पंक्तियों सी,
तेरी मुक्तक बन जकएगी।

वक्त भी बदलेगा हम भी,और
अपनी ज़िंदगी खूबसूरत सी,
किताब,सरकार बन जाएगी।
अभी तो नमी पकड़ी है हुजूर,
झुर्रियों के साथ साथ ज़िन्दगी
अपनी गुलज़ार हो जाएगी।
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