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इंसानी फ़ितरत

इंसानी फ़ितरत

इंसान की तो फ़ितरत है,
दूसरों से उम्मीद लगाये रखना,
और ज़ब उम्मीद टूटे,
तो एकदम से ख़ामोश हो जाना।
अपनी गलतियों को छिपाना,
पर दूसरों की गलतियों
की नुमाइश करना।
कड़वा है पर सच है,
आज कल लोगों में बस
यही फ़ितरत झलक रही है,
ज़ब तक मतलब है,
तब तक ही रिश्ते निभ रहे हैं।
एक दूसरे को बस हराने में
लगे हैं लोग,
अपनी अपनी हैसियत की
गुणगाने में लगे हैं लोग।
मस्ती मज़ाक़ के नाम पर
जमकर जलील किये जाते हैं,
ऊंच- नीच का दर्जा देखकर ही
समाज में इज्जत दिए जाते हैं।
फितरत कुछ इस कदर भी देखने को मिल रही है,
घाव देने वाले ही मरहम लगाये जा रहे हैं।
काम निकलवाने को ही बस मित्र बनाये जा रहे हैं।
आत्मसम्मान के नाम पर
ओवर ए्टीट्यूड दिखाते हैं लोग,
और इसे आधुनिक रित बताते हैं लोग।
वास्तव में इंसानी फ़ितरत कुछ ऐसी है,
यूँ कहें तो,बदलते मौसम
जैसी है।
माहौल के हिसाब से
खुद को ढालते हैं लोग
जैसी जरूरत आन पड़ी
वैसे ही खुद को बदलते हैं लोग।
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