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इंसानी फ़ितरत

इंसानी फ़ितरत

ना क़िताबों से पढ़ी जाती हैं,
ना कहानियों से सुनी जाती हैं,
ये इंसानी फ़ितरत तो
क़ुदरत के अनोखे क़लम से,
हर किसी के लिए बारीकी से लिखी जाती हैं।
इंसानी फ़ितरत भी थोड़ी अजीब हैं,
क़दमो को थिरका देती हैं,
जहाँ थिरकनी नहीं चाहिए
सफर की शुरुआत करवा देती हैं,
जहाँ कोई मंजिल नहीं होती
डोर को पकड़ा देती हैं,
जिसका कोई छोर नहीं होता
बेबस करवा देती हैं, अक्सर
जिसके ऊपर हमारा कोई बस नहीं होता,
शायद इसलिए ये फ़ितरत हैं,
जिसकी किसी को हर रोज आदत नहीं होती।
इंसानी फ़ितरत तो ऐसी हैं जैसे
रावण एक, उसके सिर अनेक,
इंद्रधनुष एक, उसके रंग अनेक,
ईश्वर एक, उसके रूप अनेक,
ज़ुबान पर बातें कुछ और
आँखो में ख़्वाब अनेक,
खुद इंसान का चेहरा एक,
और दिखाने को चरित्र अनेक।
फ़ितरत इंसानो की अब कहीं,
पुराणों में दफ़न हो गयी हैं,
सफेदी के रंग में लिपटा स्वभाव,
अब बस क़फ़न बन के रह गयी हैं,
किसी के जीने की परिभाषा में,
तो किसी के उत्थान की आशा में
किसी और दुर्दशा को देखकर,
ख़ुद के विकास की लालसा में,
सच तो ये है कि,
अब इंसानी फ़ितरत बस,
अपनी जिज्ञासा में किसी और की
दशा आहुति बनके हवन में रह गयी है।
सच्चाई न दिखती अब
किसी की बोली में,
वफ़ादारी न गिरती अब
किसी की झोली में,
ख़ेल के धोखे की होली
ज़मीर को सारे सबने रंग दिया,
जादूगरी कहें या फ़िर मक्कारी कहें इसे
अब फ़ितरत की झलक न दिखती
किसी के इंसानी कामों में।
कहते हैं,
इंसान भी जानवर हैं,
प्रकृति की नजरों में प्रकृतिक,
समाज की नजरों में सामाजिक,
परिवार की नजरों में पारिवारिक,
शायद ख़ेल ही सारा नजरिये का है,
वरना कुदरत ने तो सबको बनाया है शारीरिक।
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