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इंसानी फ़ितरत

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कहा गया है की मानव इस सृष्टि की,
सबसे बड़ी रचना है,
यह तो भगवान भी ना जान सका की,
यह कितनी बड़ी विध्वंशक संरचना है।
धरा पर लाया भगवान ने मानव को,
एक सुंदर लोक बसाने को।
ना जान सका हे ईश्वर तू,
जन्म दिया तूने कैसे कैसे शैतानों को।
किसी जमाने में मानव,
था रचियता एक नए युग का।
आज देखो किस तरह से,
बन गया है अंत इस युग का।
थे भरे हुए संस्कार और संस्कृति उसमें,
था भरा हुआ प्यार प्रकृति के लिए उसमें।
था मानव कृषक और पशुपालक,
आज देखो आधुनिकता में बन गया है भक्षक।
रहता था उसका मन प्रभु और देश भक्ति में,
सच्चाई और सेवा थी उसकी शक्ति में।
करता था प्रकृति की रक्षा,
होता था मन का बड़ा सच्चा।
निभाता था कर्तव्य अपना वो,
जान लुटाता था माता पिता पर वो।
प्रभु प्रसाद समझ निभाता था ज़िम्मेदारियाँ,
अपने परिवार की वो।
रहती थी समाज में सद्भावना की लहर,
हर कोई देता एक दुज़े का साथ हर प्रहर।
पूजा करता था प्रकृति की मन से,
दया रखता था जीव और जंतुओं से।
ना जाने यह कौनसा दौर है आया,
छाया हम सब पर घनघोर पाप का साया।
भूल गया मानव अब प्रभु और इस देश की सेवा,
धर्म के नाम पर ना जाने कितने हो गए बेवा।
फ़ितरत अपनी भूल गया इंसान,
अब ख़ुद को समझ लिया है भगवान।
पर उससे बड़ा आज ना है कोई शैतान,
कर रहा है न जाने किस बात पर इतना मान।
भूल गया अपना कर्तव्य अपने माता पिता के लिए,
संस्कार अपने परिवार को एक ना दिए।
पूजता था जिस प्रकृति को वो,
अच्छम्य शोषण अब उसका करता है वो।
पालनहार था जिन जीवों का वो,
लगा भक्षण उनका करने वो।
फैला रहा समाज में नफ़रत का ज़हर,
देखो कैसा है इस कल्यूग का क़हर।
बैठा है स्वयं के अहंकार और लालच में,
बर्बाद कर रहा है इस धरा को खुद के स्वार्थ में।
ना रही बची हुई अब वो हरी भरी प्रकृति,
ना ही बची है अब इस समाज में सु-संस्कृति।
हे मानव उठ खोल अपने इन चक्षुओं को,
याद कर मूल्य जो मिले है तुझे जीने को।
सम्भाल ले इस धरा और समाज को,
वरना ना बचेगा कुछ भी तेरे खुद के उद्धार को।
चल पड़ हे मानव अब सच्चाई और धर्म की राह पर,
ले चल इस समाज और धरा को प्रगति की राह पर।
संग मिल जीयो अपना जीवन परिवार और समाज के साथ,
बचा लो अपनी संस्कृति सब उठाकर अपने हाथ।
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