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नई शिक्षा नीति

नई शिक्षा नीति

नई शिक्षा नीति
शिक्षा, आज भी हमारे देश में एक चुनौती की तरह है अभी आजादी के इतने साल बाद भी हमें इस एक विषय पर बहुत अध्ययन और विचार विमर्श करने की आवश्यकता है। जहाँ एक ओर हमारे बच्चों का भविष्य इसी शिक्षा पर आधारित है। वही देश की सफलता के लिए इसी शिक्षा का इस्तेमाल करना होगा। यह लेखन नई शिक्षा नीति के ऊपर है पर पहले यह समझना होगा कि शिक्षा आखिर है क्या? शिक्षा इंसान को सभ्य एवं अनुशासित बनाती है। जीवन में कुछ बुनने का सपने दिखाने वाली और साथ ही उन सपनों को पूरा करने के लिए माध्यम बनती है।
शिक्षा की इच्छा मनुष्य के अंदर आदिकाल से ही है। पहली बार जब इस धरती पर मनु और श्रद्धा नामक दो ही लोग थे, तब से उनके अंदर जिज्ञासा पाई जा रही है। उनकी इसी जिज्ञासा ने उन्होंने मानव को जन्म दिया। मानव को खाना सिर्फ कच्चा खाना ही नहीं बल्कि खाने को पकाना भी सीखाया। कृषि के नए नए तरीकों को ईज़ाद किया और साथ ही साथ एक साथ रहने के लिए घरों का निर्माण किया। शहर बसाए और इन सभी चीजों को सुरक्षित करके आगे आने वाली पीढ़ियों के लिए इन बातों को संभाल के रखा। लिखने वाला कागज भी इस का ही नतीजा है। जिज्ञासा जो की शिक्षा का मूल आधार है। सही तरीके से शिक्षा को प्रदान कर के मनुष्य की जिज्ञासा को शांत किया जा सकता है।
इसके लिए हमें सही और कौशल शिक्षा नीति की आवश्यकता है। भारत में पहली बार शिक्षा नीति 1968 में तैयार की गई थी। दूसरी बार शिक्षा निति 1986 में तैयार की गई थी।उसके बाद 1992 में इसमें संशोधन भी किए गए थे। समय-समय पर आवश्यकता के अनुरुप भारत सरकार इसमें और संशोधन करती रही है।
आज आवश्यक है परिवर्तनशील पहलुओं से निपटने के लिए नई शिक्षा नीति लाने की लेकिन नई शिक्षा नीति में जहाँ हम प्राथमिक शिक्षा को ही नहीं संभाल पा रहे है। वहाँ हम विश्वविद्यालय और उच्च शिक्षा के विकास की ओर ध्यान दे रहे हैं। जबकि सर्वप्रथम प्रयास प्राथमिक शिक्षा के स्तर को सुधारने का होना चाहिए। जब नींव ही कमजोर हो तो मजबूत इमारत कैसे खड़ी करेंगे।
प्ले ग्रुप के पद्धति को सम्पात करना चाहिये और चार वर्ष से पहले बच्चों को स्कूल में प्रवेश की अनुमति नहीं दनी चाहियेे। पहले एक वर्ष सिर्फ मौलिक शिक्षा प्रदान करनी चाहिए जिस के लिए नई तकनीकी बहुत ही प्रभावी है।
शिक्षा की गुणवत्ता पर विशेष रूप से ध्यान देने की अति जरूरत है जिसका यथाशक्ति से पालन करना होगा।
देश की शिक्षा नीति पर सम्पूर्ण रूप से सुधार और विचार करने का यही समय है। मौजूदा नीतियों में संशोधन की बहुत आवश्यकता है दूसरे स्तर पर माध्यमिक शिक्षा प्रणाली में छात्रों को आवश्यक कौशल तथा ज्ञान प्रदान करे। इसका उद्देश्य ज्ञान के क्षेत्र मे महाशक्ति बनना तथा विज्ञान, प्रौद्योगिकी शिक्षा एवं उघोग जगत में श्रमशील की कमी को दूर करना होना चाहिए।
माध्यमिक शिक्षा के बाद का ज्ञान केवल उन्हीं के लिए होना चाहिए जो उच्च शिक्षा में आगे बढ़ने की इच्छा रखते हों तथा उनमें उच्च शिक्षा के लिए योग्यता उपस्थित हो। आज की स्थिति अत्यंत दुखदायी है जबकि हम पाते हैं कि बहुत सारे लोग स्नातक एवं परास्नातक यूँ ही कर लेते हैं और उसके बाद नौकरी तलाशते हैं। विदेशों में माध्यमिक शिक्षा तक ही अधिक लोग पढ़ाई करते हैं और उसके आगे वही लोग अध्ययन करने जाते हैं जिनका उद्देश्य केवल शिक्षा के क्षेत्र में आगे ज्ञान अर्जित करके अध्यापन एवं अनुसंधान के क्षेत्र अग्रसित होना होता है। जब अध्ययन का उद्देश्य धनोपार्जन या कुछ विशेष हो सकेंगा तभी लोग ध्यान से अध्ययन करेंगे एवं स्थितियों को गंभीरता से लेंगे।
बच्चों के मन की इच्छा जानना भी अत्यंत महत्वपूर्ण है बिना उनकी राय के कोई फैसला नहीं करना चाहिए। समय समय पर उनकी रूचि के आधार पर परामर्श केन्द्रों की सहायता उपयोगी हो सकती है।
सरकार की नीति के साथ अविभावकों को भी अपनी जिम्मेदारी समझनी होगी। पढ़ाई की इच्छाशक्ति बच्चों के भीतर जगाने का कार्य माता-पिता ही कर सकते है। शिक्षा का महत्व पहले बताया जाता है और फिर समय के साथ स्वंम् समझ आ जाता है। शिक्षा के बिना हम अधूरे है एवं जीवन का कोई सही अर्थ नहीं मिल पाता है। शिक्षा एक लक्ष्य निर्धारित कर आगे बढ़ने के लिए प्रेरित करती है।
शिक्षा से ज्ञान, कुशलता, आत्मविश्वास और व्यकित्व भी निखरता है। यह सामाजिक विकास के अतिरिक्त आर्थिक वृद्धि एवं उन्नति का मार्ग है। शिक्षा हमारे सोचने समझने की शक्ति को बेहतर बनाने का विकल्प है।
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