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अपने दिल की सुनो

अपने दिल की सुनो

किसी शायर ने दिल को,
दर्पण की संज्ञा दी है।
दिल को ही माना देवता
व ईश्वर की पदवी दी है।
अतः अपने दिल की सुनो ,
क्योंकि दर्पण झूठ नहीं बोलता।
ना ही वह सत्य को,
पैसों के तराजू से है तोलता।
जिंदगी के किसी मोड़ पर,
दुविधा के दोराहे पर।
क्या करूँ, क्या ना करूँ की स्थिति में हो अगर।
चले जाना दिल की ही ओर आँख मूंदकर,
क्योंकि दिल का कहा कभी होता नहीं बेअसर।
कई बार छिड़ जाता है,
दिल व दिमाग में द्वंद्व।
व्यावहारिक सोच रखता है दिमाग,
पर दिल नहीं होता रज़ामंद।
कभी दिल कभी दिमाग,
जीत जाता है इस जंग में।
लेकिन दिमाग हमेशा ही डालता है भंग,
जीवन के रंग में।
रिश्ते निभाने की हो बात,
या दुनियावी ज़ज़्बात।
अपने दिल की ही सुनो बात,
चाहे जैसे भी हों हालात।
बात दिल की सुनोगे तो,
कभी होगा नहीं पश्चाताप।
नींद भी चैन की सो पाओगे,
और नहीं चढ़ेगा ग्लानि का ताप।
आवाज़ अपने दिल की ही है,
अंतरात्मा की आवाज़।
ध्यान से सुनोगे तो ,
बज उठेंगे एक साथ अनहद नाद के साज़।
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