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सोशल मीडिया -अभिशाप या वरदान

सोशल मीडिया -अभिशाप या वरदान

एक सिक्के के
दो पहलुओं समान,
एक तरफ है अभिशाप
तो दूसरी तरफ वरदान।
वास्तव में जैसा इस्तेमाल
करता है इंसान,
सोशल मीडिया वैसा ही
देता है परिणाम।
कहीं, हुनर को मिल जाती
है पहचान,
तो कहीं अनेकों जुर्म को
दिए जाते हैं अंजाम।
कहीं बेरोजगारों को मिल
रहे हैं रोजगार,
तो कहीं अश्लील धंधों से
समाज को किया जा रहा बेकार।
सोशल मीडिया के ज़रिये
कोई दे रहा अपने सपनो को उड़ान,
तो कहीं इसके विपरित
प्रभाव से लोग हुए जा रहे हैं परेशान।
एक ओर अच्छे मित्र बन
जा रहे हैं दो अंजान,
तो कहीं ब्लॉक मात्र से ही
टूट जा रहे हैं कई रिश्तों से नाम।
सोशल मीडिया स्वयं में
अच्छा या बुरा नहीं है,
प्रयोग के अनुसार ही
अच्छा बुरा बनाया है हमने।

अपनी अपनी.ज़रूरत के
अनुसार ही
हर तरह से आज़माया है
हमने।
आधुनिक समय में
सोशल मीडिया बिन जीवन,
कुछ इस तरह सुनसान है
जैसे बिन छत के मकान है।
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