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दिखावें की परत

दिखावें की परत

खड़ा हैं वो एक चेहरे में,
क्यों उसके परत अनेक हैं,
वास्तविकता की बातें करते हैं,
क्यों उसके अनदेखे वादे अनेक हैं,
कभी सबके सामने,
तो कभी सबके पीठ पीछे,
झूठों का अंबार लगा देते हैं,
चरित्र एक दिखाता हैं वो,
लेकिन क्यों उसके दिखावें अनेक हैं।
सच तो यह हैं कि,
उनके हर दिखावें को समझतें हैं,
चेहरे पर लगें मुखौटे,
हमे साफ़ साफ़ दिखतें हैं,
बस भरोसे के ग़ुलाम हैं हम,
पर शायद खुद के इस,
दिखावें से हम भी डरते हैं।
पर कब तक इस दिखावें में,
उनकों पलने दोगे,
विश्वास के अंधेपन में,
क्यों खुद को गिरने डोगे,
दिखावें की परत ही तो हैं,
तुम और हम संघर्षों की मूरत हैं,
क्यों मुखौटे पहनें किसी को,
अपने भीतर तक को झकझोरने दोगे।
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