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हद

हद

हद की न होती है कोई हद,
हर इंसान चाहे 'हद' बेहद।
हद का कोई पैमाना नहीं,
लड़का-लड़की बड़े या छोटे,
किसी ने हदों को आजतक पहचाना नहीं।
समाज ने बनाई लड़किओं के लिए हदें,
जो बनगई धीरे धीरे जैसे सरहदें।
एक हद के ऊपर सब है व्यर्थ,
क्यों समाज नहीं समझता हद का अर्थ।
जो लड़का करे पार,
तो घर में शरण ले अत्याचार।
यदि लड़की न निभाए हदों का वादा,
तो घर की भंग होती मर्यादा।
छोटा भी यदि अहं दिखाए,
अपनी हद से भर कहलाये,
बड़ो का गुरूर जब सर चढ़ जाये,
हदों के परिकाष्ठा को पार कर जाये।
जब हदों का अस्तित्व है,
सभी के लिए समान निर्मित,
फिर 'हद' शब्द को क्यों किया,
समाज ने लड़कियों तक सीमित।
जरा सोच के देखना 'हद 'शब्द ज़रा,
यदि ख्याल में जिक्र लड़कियों का न हो,
तब होगा तुम्हारी सोच का परिचय सोने सा ख़रा।
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