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ऑनलाइन बनाम ऑफलाइन

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एक ज़माना था जब जीवन में,
मिलते थे अपनों से और दोस्तों से,
नुक्कड़ की चाय की दुकान पर,
कहते थे दिल का हाल एक दूज़े से खुलकर।
था समय एक वो भी जब जाते थे,
अपनों से मिलने उनके घरों पर,
मिलते थे गले मिलकर और होती थी,
हर तरह की बातें दिल खोलकर।
होते थे खेल कई सारे अलग अलग,
मैदानों की खुली हवा में और हरी घास पर,
लड़ते थे और मनाते थे दोस्त एक दूज़े को,
हंसकर और खूब सारी मस्तियाँ लेकर।
रविवार के दिन मन में रहती थी मस्त हलचल,
करनी जो होती थी खरीददारियाँ जमकर,
होता था अलग ही चटकारा ज़ुबान पर,
जब खाते थे पकवान अलग अलग सब मिलकर।
मज़ा उसमें भी था जब टिकट कटानी होती थी,
दिनभर लम्बी लम्बी लाइनों में लगकर,
होती थी मन में भक्ति भावना दर्शन की,
बड़े बड़े मंदिरों के पट पर लगी लाइनों पर।
यह वही ज़माना था जब ऑनलाइन कुछ था नहीं,
अब ऑनलाइन सुविधाओं को छोड़ कुछ बचा नहीं।
मिलते हैं विडीओ चैट पर दोस्तों और अपनों से,
होते हैं अब खेल सारे ऑनलाइन वाले ऐपों पे,
खरदीदारियाँ भी सब होने लगी ऑनलाइन दुकानों पर,
अब उपलब्ध है खान पान भी ऑनलाइन की दुनिया पर।
अब टिकट कटाना हो कहीं का भी,
या दर्शन करने हो किसी भी भगवान के,
बस खोलो ऐप कोई और करलो अपना काम,
अब ना रहा वो लाइनों में लगने वाला काम।
अब हो चाहे पढ़ाई या दिखाना हो डॉक्टर को,
बुलाना हो किसी मिस्त्री को या ब्यूटिशन को,
या करनी हो खोज वर-वधू की नए रिश्ते को,
बस खोल मोबाइल की दुनिया निपटा लो अब ख़ुद को।
अब शायद वो दिन भी दूर ना होगा,
जब किसी का एक दूज़े मिलना भी ना होगा,
ना होगा कभी घर से बाहर निकलना किसी काम से,
जब हो जाएगें निर्भर ऑनलाइन दुनिया पर हर तरह से।
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