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आस्था/अक़ीदा

आस्था/अक़ीदा

रुसवाईयाँ हर कदम पामाल करती रही,
हर कदम पे किस्मत सवाल करती रही।
ग़र्क नही क्या? क्यों समन्दर ने,
दरीया हर पल ढाल बनती रही।
लहरों ने उछाला नहीं फिर भी,
कश्तियाँ बवाल पे बवाल करती रही।
मिटती खलिश कैसे, दिल की
चुगलियां धीरे धीरे, कमाल करती रही।
खंजर प्यार से उतारा नफ़्स में,
ग़ैरत उन्हें, बेहाल करती रही।
नुमाइश की रईसी ने मिटा डाला,
ग़रीबी बार बार बदहाल करती रही।
अक़ीदा ने ही, सम्भाल रखा नीलोफ़र,
वरना जिंदगी तो ज़वाल करती रही।
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