Custom Pages
[vc_separator type='transparent' color='' thickness='' up='20' down='7']
Portfolio
[vc_separator type='transparent' color='' thickness='' up='20' down='7'] [vc_separator type="transparent" position="center" up="12" down="16"]
 

आस्था

आस्था

के ,क्या स्थान होगा जैसा,
मिलता माँ बाबा के चरणों मे।
है परवरिश के गैरो में भी, स्थान मिलता अपनो में।
मन्दिर में न मज्जिद में,
मामला गम्भीर वही है।
हाथ है खाली मेरे और,
आस्था की पीर नही है।
ज्यादा बड़ा हो न सही,
मुद्दा गम्भीर वही है।
तुम मौला को पूज लो,
मैं मेरे राम को पूजूं।
बात है इतनी सी की,
प्रेम है मीठा सा,
कोई जंजीर है।
बात है इतनी ही कोई,
गम्भीर नही है..
मैं प्रीत बनु कृष्णा की,
तुम तृष्णा ले जाओ।
मैं मन्दिर चली जाउंगी,
तुम मज्जिद में ठहर जाओ।
राह है वो एक ही तुम,
तो साथ आ जाओ।
भक्ति है ये अपनी अपनी,
कोई जंजीर नही है।
इंसान है जो हम तुम,
तो पीर वही है।
ज़रा सी पीर वही है,
मुद्दा गम्भीर नही है।
मैं राम के जैसी,
उन्ही के राह पर चलु,
मात पिता का प्रेमी ,
तो कोई और नही है।
प्रेम ही करूँगी मैं तो,
मुझसे भक्ति भी होगी।
गुरुकृपा को छोड़ आशा,
कोई और नही है।
कलियां भी खिलती है राधे,
बड़े औऱ सख्त पेड़ो में।
आस्था है प्रेम है भक्ति है,
कोई जंजीर नही है।
जीवन है ये प्यारा,
कोई रणवीर नही है।
रंगत है ये उस राम की,
कोई मुद्दा गम्भीर नही है।
No Comments

Post A Comment