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लॉक्डाउन से सीख

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चल रही थी ज़िंदगी बड़ी आराम से,
सब व्यस्त थे अपने अपने काम से,
पर थी ना खबर किसीको इस अंजाम से,
किसने क़हर बन ढाया सितम पूरे इस जहाँ पे।
पहले मिलते जुलते थे बड़ी शान से,
अब डर से पास नहीं आते एक दुज़े इंसान से,
था जहाँ घरों में अतिथियों का मेला,
आज भय से निकलती नहीं यह बेला।
थे हालात ऐसे ही साल १९१८ में,
याद दिला दिया किसीने फिर से ज़माने में,
ढाया है क़हर ना जाने किस नामाकूल ने,
सुना है फैलाया यह ज़हर किसीकी भूल ने।
एक समय था जब हंस बोलकर हाथ पकड़ कर घूमते थे,
विदेशों में एक दूसरे को प्रेम पूर्वक चूमते थे,
आज समय आ गया है कैसा,
ना रहा कुछ भी अब पहले जैसा।
जाते थे सब बाज़ारों और कार्यालायों में,
लगते थे मेले लोगों के हाट और गलियारों में,
आज सूने पड़े हैं सब मेले और चौपाल,
फैला हुआ है सर्वत्र कोरोना का भौकाल।
बंध पड गए शिक्षालय सारे चहुँ तरफ़,
होने लग रही है ऑनलाइन पढ़ाई अब,
व्यवस्था है सब मोबाइल और कम्प्यूटर पर अब,
हो चाहे नौकरी, व्यवसाय या पूरे देश की अर्थव्यवस्था।
ना जाने कितने लोगों की जाने गयी है,
ना जाने कितने घर हुए तबाह और बर्बाद,
ना जाने कितनो की रोटी छीनी है,
दब सी गयी है हर एक इसान की आवाज़।
कर रहा है कोई राजनीति इस पर,
उठ गए कितनो के बोरिये बिस्तर,
लगे है फिर भी जान की बाज़ी लगाने,
अनगिनत पुलिस, सफ़ाईकर्मी और डॉक्टर।
है कितने महान यह अग्र पंक्ति के लड़ाके,
लगे है अपने धर्म और कर्म पर सब त्याग करके,
और एक हम है जो सुनते नहीं किसीकी,
कर रहे है सब अपने अपने मन की।
ना जाने और कितनी जानें कुरबान होगी इस समय में,
ना जाने और कितने घर कारोबार ध्वस्त होंगें इस प्रलय में,
ना जाने कितनों की चीखें और गूंजेगी,
ना जाने कितनो की आह भी नहीं निकलेगी।
अब भी सुन लो बातें समझदार बनकर,
करो पालन हर एक निर्देशों का समझदार बनकर,
ना मानोगे अगर बात किसीकी भी,
तो रह जाओगे इतिहास में सिर्फ़ नाम बनकर।
कर लो कुछ समय और इंतेज़ार,
समय और प्रकृति लाएगें फिर से बहार,
खिलेगी रोशनी जमकर अंधकार में,
होगा उदय एक नयी मानवता का इस संसार में।
करलो यक़ीन खुद पर तुम सब,
जीतेंगे यह लड़ाई हम मिलकर सब,
करेंगे एक नए युग का निर्माण इस बार,
फिर ना करगें कभी प्रकृति का तिरस्कार।
बस यही कामना है हो भला इस जग का,
हो कल्याण सभी इंसानों और इस धरा का,
ना रहे कभी कोई घोर संकट ऐसा समाज में,
विस्तार करो इंसानियत-दया का इस समाज में।
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12 Comments
  • Rashmi baweja
    Posted at 06:53h, 06 September Reply

    Very nice

  • N Pugazhendhi
    Posted at 07:48h, 06 September Reply

    Fabulous…

  • दिनेश शर्मा
    Posted at 09:58h, 06 September Reply

    बढ़िया, ।।।।
    पहले तन्हाई यो से घबराते थे,, अब तो महफ़िल में जाने से भी डरते है।।

  • Uday Pokarnekar
    Posted at 10:20h, 06 September Reply

    Very nice

  • Gagan Sarswat
    Posted at 11:08h, 06 September Reply

    मुसाफिर घुमकड़ प्रजाति के होते हैं उनको घर की चार दिवारी में रहना रास नहीं आता है, कितना खाया कितना पिया कितना सोए कितनी फिल्में देखी एक समय के बाद सब बकवास लगता है।

  • Mahima Choudhary
    Posted at 11:09h, 06 September Reply

    Fabulous and very heart touching lines…too gud and awesome❣️👍

  • Mahima Choudhary
    Posted at 11:10h, 06 September Reply

    Very heart touching lines…too gud and awesome❣️👍

  • Shubh Bohra
    Posted at 11:39h, 06 September Reply

    nice one

  • Vivek Garg
    Posted at 13:22h, 06 September Reply

    Lalit has put up the true picture of disaster created by a virus.. which is not more than 1 gram in totality created havoc, which has taken away our peace our money and more importantly our loved ones…😱😖

    This is the biggest tragedy of this century..we pray that medicine for such illness should come at the earliest and normalcy returns.

  • raj sharma
    Posted at 15:05h, 07 September Reply

    fabulous shayari , the real meaning of lockdown i get to know

  • Dharmendra kumar Jha
    Posted at 17:20h, 07 September Reply

    Very nice

  • Mohammed Umaru
    Posted at 20:20h, 07 September Reply

    Welldone dear

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