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वर्तमान सन्दर्भ में शिक्षा और शिक्षक

वर्तमान सन्दर्भ में शिक्षा और शिक्षक

शिक्षक ज्ञान व सफलता का पहला आधार है जिसके अनुपस्थिति में सफल जीवन की कल्पना नहीं की जा सकती है। शिक्षक ही हमारे सफलता की मजबूत नींव है। विद्यार्थी जीवन में शिक्षक का अत्यधिक महत्व होता है क्योंकि शिक्षक ही हमारे ज्ञान और जीवन मूल्यों के आधार है। शिक्षक हमारे मार्ग दर्शक होते हैं एवं हमारी सफलता के पीछे उनका महत्वपूर्ण योगदान होता है। शिक्षक के बिना हमारा जीवन अंधकारमय है। शिक्षक ही हमें सत्य-असत्य की पहचान कराते हैं एवं नैतिक मूल्यों को भी सिखाते हैं। हमारे भीतर ज्ञान का प्रकाशित होना गुरु के द्वारा ही संभव हो पाता है।
कबीर की एक पंक्ति है - "ग्यान प्रकाशा गुरु मिला"
वैसे तो हमारे अभिभावक हमारे प्रथम गुरू होते हैं एवं उनसे भी हमें बहुत कुछ सीखने को मिलता है किंतु शिक्षक की उपस्थिति हमारे जीवन में बहुत अहमियत रखती है। शिक्षक अर्थात गुरु को तो ईश्वर से भी बड़ा दर्जा दिया गया है क्योंकि ईश्वर तक पहुँचने का मार्ग भी हमें गुरु ही बताता है।
कबीर की ही पंक्ति है -" गुरू गोविंद दोऊ खड़े, काके लागू पाय । बलिहारी गुरु अपने, गोविंद दियो बताय।।"
सभी मनुष्य के भीतर गुण-अवगुण दोनों पाए जाते है किंतु हमारे भीतर के दोषों को मिटा पाना शिक्षक द्वारा ही संभव है। शिक्षक सही-गलत की पहचान कराकर जीवन में आगे बढ़ने के लिए प्रेरित करते हैं अतः बिना गुरु के हमारा जीवन सार्थक व सफल नहीं हो सकता ।
कबीर जी कहते है - "गुरु बिन ज्ञान न उपजै, गुरु बिन मिलै न मोष । गुरू बिन लखै न सत्य को,गुरु बिन मिटै न दोष ।।"
परन्तु वर्तमान समय में शिक्षा का उद्देश्य केवल धन प्राप्ति हो गया है। धन के लोभ में आकर अर्धज्ञानी भी अपने अधूरे ज्ञान के बल पर स्वयं को शिक्षक प्रमाणित कर विद्यार्थियों के जीवन के साथ छल करते हैं। विद्यार्थी ही हमारे देश का भविष्य है अतः भविष्य के सुरक्षा की बागडोर शिक्षकों के हाथों में ही होती है इसलिए गुरु का कर्तव्य बनता है कि वे अपने शिष्यों को उचित ज्ञान दे,उनका मार्गदर्शन करें, एवं जीवन को विकसित बनाने के लिए उन्हें प्रोत्साहित करें। अतः विद्यार्थियों को ऐसे गुरु की तलाश करनी चाहिए जो उनके जीवन को सफल बना सके,उन्हें ज्ञान से परिपूर्ण कर सके एवं शिक्षा के प्रति उनके मन में सच्ची निष्ठा जगा सके। यदि गुरू ही अज्ञानी हो तो उसका शिष्य महा अज्ञानी होगा।।
कबीर कहते हैं - " जाका गुरू भी अंधला, चेला खरा निरंध अंधहि अंधा ठेलिया, दोनों कूप पडंत ।।"
वर्तमान में विद्यार्थियों का शिक्षा के लिए उद्देश्य केवल नौकरी प्राप्ति तक ही सीमित हो गया है अर्थात नौकरी प्राप्त करने के उपरांत गुरू से उनका कोई सम्बंध नहीं रह जाता। विद्यार्थियों के मन में गुरू के प्रति निष्ठा भाव जैसे विलुप्त होते जा रहे हैं तथा गुरु एवं विद्यार्थी के बीच की दूरी दिन-प्रतिदिन बढ़ती जा रही है।
कबीर कहते हैं कि शिक्षा प्राप्ति साधना की तरह होती है। साधना की सफलता के लिए गुरू और शिष्य दोनों का सच्चा और निष्ठावान होना आवश्यक है अन्यथा दोनों की साधना मात्र दिखावा है,भ्रम है,निरर्थक है। सच्चे गुरू केवल अपने विद्यार्थी से यही चाहते हैं कि उनके शिष्य जीवन में सफलता प्राप्त करें और अपने जीवन को सार्थक व उन्नत बनाये। इसी प्रकार सच्चा विद्यार्थी भी वही होता है जो अपने कार्यकलापों एवं गतिविधियों के द्वारा माता-पिता के साथ-साथ अपने गुरू का शीश भी गर्व से ऊंचा कर सके । यदि सच्चा गुरु नहीं मिलता है और न ही सच्चा निष्ठावान शिष्य ही मिलता है तो दोनों लालचवश केवल अपने-अपने स्वार्थ की सिद्धि में लगे रहते हैं।
कबीर जी ने कहा है - "न गुरु मिल्या न सिष भया,लालच खेल्या डाव । दोनों बूड़े धार में,चढ़ि पाथर की नाव ।।"
निष्कर्ष के रूप में कह सकते हैं कि शिक्षक ही हमारे सफलता की कुंजी है। यदि हमें सफलता प्राप्त होती है तब वो केवल हमारी ही नहीं अपितु हमारे गुरु की भी विजय होगी। यह विजय सफलता एवं सार्थक जीवन की विजय होगी। अतः सफलता प्राप्ति हेतु शिक्षक का हमारे जीवन में महत्वपूर्ण योगदान है एवं शिक्षक के ऋण को हम कभी नहीं चुका सकते।
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