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चादर मैली सी

चादर मैली सी

सिर खुले, तो पाँव ढके,
पाँव खुले, तो सिर ढके।
विवश्ता की मर्यादा फैली सी,
हाँ थी ग़रीब की चादर मैली सी।
आँख उठे, आकाश निहारे,
बूँद बूँद बरसे, बादल सारे।
बदबू लगे विषैली सी,
हाँ थी ग़रीब की चादर मैली सी।
खुद को इतना सिकोड़ लिया,
खुद को खुद से जोड़ लिया।
इंसान लगे थैली सी,
हाँ थी ग़रीब की चादर मैली सी।
हाँ थी ग़रीब की चादर मैली सी।
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