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दान या दिखावा?

दान या दिखावा?

कल तक दान जो चरित्र का दावा था,
आज वही दान कैमरे पर मात्र एक दिखावा है,
जहाँ किसी के पास खाने लायक अन्न नहीं है,
आज वही अन्न किसी के लिए एक लाइक का बढ़ावा है।
दान कैसे किसी के लिए ढिंढोरा बन सकता है,
दान तो किसी के अंधेरा जीवन में उजियारा ला सकता है,
कैसे समाज के कुछ लोगों ने इसे भी कलंकित कर दिया,
कैसे कोई आज दान को बस एक दिखावा बना सकता है।
कहते हैं...
दान एक हाथ से दो,
दूसरे को पता ना चले,
पर शायद कलयुग में कुछ बदल गया है,
यहाँ दान का मतलब बस समाज मे दिखावा रह गया है।
सच तो यह हैं कि,
उनके हर दिखावें को समझतें हैं,
चेहरे पर लगें मुखौटे
हमे साफ़ साफ़ दिखतें हैं।
बस भरोसे के ग़ुलाम हैं हम,
पर शायद खुद के इस
दिखावें से हम भी डरते हैं।
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