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अधिकार मेरा, मैं लेकर रहूँगी

अधिकार मेरा, मैं लेकर रहूँगी

दुनियाँ का हिस्सा हूँ,
पर अलग सा किस्सा हूँ,
कहने को तो मुझे हक है सब,
हकीकत में मिलेगा जाने कब?
कहने को आजाद हूँ मैं,
पर अनेकों बेड़ियां मेरे पैरों में बँधी,
चाहे कहे कोई कुछ भी,
बराबरी न मुझे अब तक मिली।
जहाँ होनी चाहिए मैं कक्षा में,
मैं तुम्हें रसोई घर में भाँती,
कहती दुनियाँ ज्ञान है जरूरी,
मुझे अँधकार के अज्ञान में रखना चाहती।
क्यों पढ़ लिखकर बनना अफसर,
नहीं हो सकता मेरा ख्वाब,
क्यों बाँधी मेरे सपनों पर बेड़ियां,
क्या दे सकते हो इसका जवाब?
कहते शिक्षित होकर करना क्या?
विवाह कर तुम्हें दूसरे घर है जाना,
पढ़ लिख कर तुम करोगी क्या?
आखिर चूल्हा चौका ही तो है चलाना।
कहते मिलती सौभाग्य से मैं,
पर देखो कैसा भाग्य मेरा,
जहाँ पूजते सरस्वती को ज्ञान रूप में,
देखना चाहते अशिक्षित मुझे,
हाय कैसा दुर्भाग्य मेरा।
पर अब इन बेड़ियों से तुम मुझे न रोक पाओगे,
बदलेगा तकदीर का पासा,
बढ़ता देख तुम मुझे,
सफलता के शीर्ष पर पाओगे।
ना रहूँगी वंचित शिक्षा से,
अपने हकों के लिए,
फिर चाहे खुद से लड़ जाऊंगी,
वो दिन दूर नहीं,
जब मैं, अपना हर स्वप्न पूरा कर दिखाऊंगी।
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