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इच्छाएँ

इच्छाएँ

ज़िन्दगी भी कितनी अजीब होती है। हमारे पास जो होता है। हमारी इच्छाएँ उनसे बहुत अलग होती हैं। जो बच्चे स्कूल नही जा पाते पढ़ने के लिए उन्हें विद्या की कीमत पता होती है। वो स्कूल जाने के लिए तरस जाते हैं। वो पढ़ना चाहते हैं।
"काश हमारे कंधे पर भी इस बस्ते का बोझ होता,
मजबूरियों के नाम पर यूँ ज़िन्दगी में खुद को न खोता"
और जो बच्चे स्कूल नही जाना चाहते उन्हें जबरदस्ती उनके माता पिता स्कूल भेजते हैं तो वो वही सोचते हैं काश हमे स्कूल न जाना पढ़े।
"काश मैं भी यूँ जिंदगी में आज़ाद घुम पाता,
उसकी तरह मैं भी कंधों पर यूँ बोझ न उठाता"
जिन बच्चों को जीवन मे सब कुछ मिलता है। वो उनकी कीमत को नही जानते वो सोचते हैं कि दूसरे के पास जो है वो ज्यादा अच्छा है। जिन बच्चों के माता पिता उनके पास रहते हैं वो सोचते हैं"
"काश हम भी उनकी तरह आज़ाद रह पाते,
बिना पाबंदियों के ज़िन्दगी को खुल के जी पाते"
और जो बच्चे घर पर अकेले रहते हैं उनके माता पिता किसी न किसी काम मे व्यस्त रहते हैं उनकी सोच होती है।
"काश दो पल का उनके पास मेरे लिए वक़्त होता,
कभी तो मेरे गम और खुशियो में उनका साथ होता"
हमारे जीवन मे इच्छाओं का कभी अंत नही होता। हमे ईश्वर जो देता है। हमारी इच्छा उसे कई अधिक होती है। हम जो चाहते हैं वो भी अगर हमे मिल जाये तो हमे जीवन मे कभी संतुष्टि नही होती।
"काश हम भी जीवन की कीमत को समझ पाते
इच्छाओं की जगह संतुष्टि से जीवन जी पाते"
जीवन तो निरंतर अपनी गति से चलता रहता है। समय कभी किसी के लिए नही रुकता ये हमारे ऊपर निर्भर करता है। हम अपनी इच्छाओं को महत्व देकर खुद को तकलीफ देते हैं। या जो मिला है उसे संतुष्ट होकर जीवन को खुशियो से भर देते है। इसलिए जो जिसको मिला है उसे उसी में संतुष्ट रहना चाहिए। इच्छाओं के लोभ में जो है उसे खोना नही चाहिए।
"ज़िन्दगी की महत्वता को अगर तुम समझ जाते,
जो है उसमें ही ज़िन्दगी की खुशिया बटोर जाते"
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