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बेबस बचपन

बेबस बचपन

भोला लेकिन लाचार था उसका बचपन,
गरीबी की लकीरें माथे पर, हाथों में थे झूठे बर्तन,
मन मस्तिष्क में द्वंद लिए बाहर से ही देखता विद्यालय का द्वार बंद,
अनगिनत इच्छाएं जागृत होती, पल में ही टूट जाते सारे स्वपन,
लालायित नजरें देखती किताबों के बोझ से झुके कंधे, स्कूल छोड़कर जाती माओ के आलिंगन,
अश्रुपूरित आंखों से देखकर नीला गगन चित्कार उठता मन में लिए लाखों प्रश्न,
अनगिनत सवाल उठते और शांत हो जाते, लाचार जो था उसका बचपन,
शिक्षा केवल अमीरों की चौखट पर देती क्यों दस्तक, आहत हो जाता गरीब बच्चे का मन,
काश विद्या की देवी झूम के नाचती गरीब के भी आंगन,
लक्ष्मी न सही सरस्वती तो करती गरीब के घर वीणा वादन,
नियति इतनी कठोर कैसे हो सकती है,
कोई किताब कोई कलम गरीब की झोली में क्यों नहीं आ गिरती है,
काश कोई मसीहा पढ पाता गरीब बच्चों के टूटे मन,
ईश्वर अजब तेरी कारीगरी गजब तेरा संचालन,
किताबें पढ़ कोई बनता वकील बैरिस्टर,
कोई माँजता झूठे बर्तन कितना लाचार कितना बेबस बचपन।
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