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माँ

माँ

मेरी हर शामों में से गुज़रा एक वो भी एहसास है,
"माँ" के साथ गुज़रा मेरा हर-एक लम्हा ख़ास है।
ग़म हों या हो मुश्किल कोई भी राह-ए-जीस्त में,
आँख बंद करने पर मेरी माँ होती मेरे ही पास है।
बेशक़ तर हो जाऊँ ज़िन्दगी की हर-एक ख़ुशी से,
रहेगी हर–लम्हा मुझे माँ की मुहब्बत की प्यास है।
"माँ की ममता" का मोल ना चुका पाया कोई भी,
ग़म होते ज़ाया ओढ़ने से,ऐसा माँ का ये लिबास है।
कैसे उतारूँगा मैं इस जहाँ में माँ का क़र्ज़ "हैदर",
उनकी क़र्ज़दार जिस्म मेरा, मेरी हर इक साँस है।
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