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माँ…

माँ…

इक अक्षर का छोटा सा शब्द..
पर अनेकों भावनाओं का विराट रूप..
जो माथे पर लहराते चाँद से बिन्दु में समाया है..
समंदर की गहराई छिपी है इस शब्द में..
अथाह..अनंत..असीम..
बात..कुछ यूं है कि…जिसने हाथ थामा पेंसिल पकड़ाई लिखना सिखाया…
आज उसी की मद्धम सी लिखावट..
उस पर कुछ लिख रही है..
"कुछ"..कुछ इसलिए कहा क्युंकि माँ को अल्फाजों मे बयां करना उतना ही मुश्किल है जितना.. अंबर के तारों की गिनती करना..क्युंकि मेरे शब्दकोश में अनगिनत अल्फ़ाज़ तो नहीं..पर अनगिनत जज़्बात ज़रूर है..
माँ…
माँ वो शब्द है जिसमें भावनाओं का भण्डार ,या कहुं पूरा.. ब्रह्माण्ड है…
रेगिस्तान में..जब व्यक्ति भटक कर राह की खोज में व्याकुल हो जाए..पर आस हो मन में कि हां.!!राह मिलेगी जरूर…
उस आस सी ही तो होती है माँ…
कही फूल की मनमोहक महक है माँ…
तो कहीं जौहरी की तिजोरी का वो अनमोल रत्न है माँ..
स्याही रातों में पूनम के चाँद सी नूरानी है माँ…
थोड़ी मीठी थोड़ी तीखी सी है माँ..
कभी प्यार से समझाती तो अक्सर फटकार भी लगा देती है माँ…
…लोग बिना कुछ सोचे बस यूहीं कह देते है उनसे,,कि माँ आप आखिर समझती क्यूं नही..!
पर उन्हें यह नहीं पता कि तुम्हारे बिना कुछ कहे ही वो हर बात भाँप लेती है..
जो नौ महीने की पीढ़ा..खुशी-खुशी सहन कर लेती है..!!,खुद दीवार बन कर खड़ी रहती है..!!
वो मां समझती क्यों नहीं..!
अरे..!
माँ तो शम्स (सूरज) के समान हैं जो डूबता है चाँद को उगाने के लिए…
अक्सर भीड़ में..
हाथ थाम लेती है माँ..
बचपन मे उंगली पकड़ती..पैरो पर खड़ा करती.. चलना सिखाती और कैसे हम बार - बार गिर जाते और रोने लगते तो चुप करवाती और फिर हौसला बढ़ाती और फिर अगले दिन प्रयास करवाती…
जब रात को…सहम जाता था डरावना सपना देखकर..तो गले से लगा लेती थी माँ,
याद है कैसे मुझे बुखार होने पर
रात रात तक जगती थी और ठण्डी पट्टी लगाती थी माँ.
मतलबी सी इस दुनिया में निस्वार्थ भावना ही सर्वश्रेष्ठ भाव है सिखाती है माँ..
अपने अनुभव से शिक्षा लो यह बात भी तो बतलाती है माँ..
आख़िर में बस यही कहना चाहूंगा
माँ की तुलना शायद किसी से नहीं की जा सकती.
माँ के लिए तीन सौ पैंसठ दिनों में से एक दिन चुना आवश्यक नहीं है..!
पर हर क्षण आपके लिए किए गए
पर हर क्षण आपके लिए किए गए उसके हर त्याग को ज़हन में याद रखना…

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