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मेरी माँ – मेरी जान

मेरी माँ – मेरी जान

क्याँ लिखू मैं उसके बारे में जो खुद ही एक सुंदर कविता है,
माँ जैसा कोई और नहीं यारों,
उसके सामने झुकता हर एक का माथा है,
माँ का प्यार कभी गिना नहीं जाता,
उसके जैसा भगवान और नहीं होता।।
खामोशी मे हर दर्द वो पहचान लेती है,
खुद का दर्द सहकर बस हसती रहती है,
जुबान पे उसके सबके लिये दुवा ही होती है,
माँ के एक झप्पी मे ही जन्नत होती है।।
माँ के पेहलु मे सुकून की चाबी होती है,
पुरी दुनिया इन हाथों में आ जाती है जब,
माँ दिल खोल के मुस्कुरा रही होती है,
माँ को मैं एक कविता में कैसे बयान करूँ?
मेरी जान तो मेरी माँ में ही बसती है।।
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