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मेरी पहचान

मेरी पहचान

क्या हुआ जो मैं तुझसे आज रुठ गयी?
क्या हुआ जो फिर से आज टूट गयी?
क्या हुआ जो फिर से मैं ना मुस्कुरायी?
क्या हुआ जो मैं फिर से जी ना पायी?
क्या हुआ जो मेरे भी कुछ अरमान है?
क्या हुआ जो मेरा भी कुछ सम्मान है?
क्या हुआ जो मैं भी गर्व से सिर उठाऊँ?
क्या हुआ जो मैं खुद से भी नज़रे मिलाऊँ?
क्या हुआ जो समाज आज भी है मुझे कोसता?
बस किसी की माँ,बेटी, बीवी, बहन है बोलता,
क्यों मेरी पहचान जानने से ज़माना कतराता है?
झूठे वादे दे कर आज भी मुझे फुसलाता है,
छोड़ कर उंगली तेरी मै उड़ तो नहीं जाउंगी!
हौसला है बुलंद मेरा, तेरा सिर गर्व से ही उठाऊंगी।
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