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कोरोना में बेरोज़गारी

कोरोना में बेरोज़गारी

हुआ आगमन एक भयंकर महामारी का,
मचा प्रलयंकारी कोहराम बड़ा भारी सा,
किया बर्बादी और मौतों का उद्घोष जग में,
न बचा कोई इसके ख़तरनाक पंजों से।
फैला चहुँ ओर बर्बादियों का पाश इसका,
बचने का न मिला कोई उपाय जिसका,
दिया उखाड़ बड़ी बड़ी अर्थ्व्यवस्थाओं को,
दिया उखाड़ बेरहमी से लाखों की साँसों को।
न जाने कितनों की छीन ली रोटी इसने,
न जाने कितनों के घरों को किया बर्बाद,
ना जाने कितनों का लूट गया है व्यापार,
ना जाने कितनों का डूब गया जग संसार।
लाखों लाखों लोगों का छूट गया व्यापार,
यहाँ तक के बड़े घरानों का भी उठ गया क़ारोबार,
घटने लगी अर्थव्यवस्था में लोगों की नौकरियाँ,
आ गई सड़कों पर न जाने कितनी जिंदगियाँ।
जो पहले थे सुबह से लेकर रात के किसी के नौकर,
आज खा रहे हैं बिना काम कर दर दर ठोकर,
हैं भूखे पेट बिलख रहे उन मज़लूमों के बच्चे,
हो रहे तबाह ग़रीब और मिडल क्लासों के तबके।
जिनको न थी पहले फ़ुरसत घर की ख़ुशियों की,
जिन्हें न थी आदत अपनों के साथ दो पल बैठने की,
आज आ गयी है नौबत देखो कैसी पूरी दुनिया में,
घर बैठे बैठे दूभर हो गया जीवन बेरोज़गारी में।
आज तिल तिल कर मर रहे हैं कई लोग यहाँ,
जिनके पास नहीं जुगाड़ दो रोटी का भी जहाँ,
कर रहे देखो कैसे यात्रा हज़ारों मिलों की पैदल चल,
मुश्किलों में फँसे को आ रहा है याद घर जहाँ।
सरकार भी बैठी है अपनी आँखें मूँदे,
उसे कहा पड़ी है चाहे मरे हज़ारों बंदे,
उसे तो पड़ी है सिर्फ़ वोटबैंक की चिंता,
कहाँ देखे उस तरफ़, जहाँ जल रही है,
बेरोज़गारी की मार से मरे लोगों की चिता।
आज भी कर लो थोड़ा सरकार ध्यान इस तरफ़,
जब हो जाएगा सब बर्बाद तो जाओगे किस तरफ़,
थाम लो आज हाथ उन मज़लूम बेचारे मज़दूरों का,
जिनके पास रोज़गार के अलावा अब ना बचा रास्ता,
ज़िंदगी में और कुछ कर गुज़रने का।
निकाल दो अंधेरों में फँसे उन बेरोज़गारों को,
लगवा दो नौकरियाँ नई उन मंझे कलाकारों को,
ले आओ कोई निर्णायक रणनीति कोई अपनी,
मिले नए अवसर बेरोज़गारों को काम काज का,
आज पुकार है पूरे देश की, सम्भालो नौजवानों को यहाँ।
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