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माँ

माँ

माँ,
यूँ तो कई नाम है इसके सबकी अपनी भाषा में, कोई माँ कहता है कोई आई तो कोई अम्मी, शब्द भले ही अनेक हो लेकिन हर शब्द एक ही भावना के साथ बोला जाता है।
माँ शब्द वो सत्य है जिसके बिना ये जीवन महसूस करना भी बहुत जटिल सा होता है।
माँ तुझसे बहुत कुछ कहना है, तुझसे बहुत सारी बातें करने का हर वक़्त मन करता रहता है, लेकिन जब भी तुम सामने होती हो ना तो पता नहीं क्यों वो बातें हो नहीं पाती हैं। माँ अभी तुमसे माफी मांगना भी तो बाकी है, उन सब बातों का जो जाने अनजाने में तुमसे कर देते है, बिना मतलब जब तुम पर चिल्ला देते है, पापा की बात का गुस्सा तुम पर ही उतर देते है, घर की हर छोटी बड़ी गलती का जिम्मा अपने सर ले लेती हो और हर अच्छे काम का श्रेय किसी और को दे देती हो, लेकिन गिर भी हर बार तुम मुस्कुराती रहती हो कभी ये सोचकर कि चलो बच्चों का गुस्सा तो शांत हुआ तो कभी ये सोचकर कि घर वालों की खुशी में ही तुम्हारी खुशी है।
पर वास्तव में तुम्हारी खुशी का तो किसी को ख्याल भी नहीं आता। घर मे किसका जन्मदिन कब है तुमको सब पता होता है लेकिन तुम खुद अपना जन्मदिन कभी नहीं मनाती हो। सुबह सबसे पहले उठती हो कभी अपनी नींद की फिक्र नहीं करती हो सिर्फ इसलिए कि बच्चों का लंचबॉक्स तैयार कर पाएं लेकिन घर वालों की नींद पर कोई आंच नहीं आने देती हो। हर वक़्त सबसे खाने का पूछती रहती हो कि क्या खाओगे आज वही बनाएं सबके मन पसंद भोजन तुम रोज़ बनाती हो लेकिन कभी ख़ुद के पसन्द की नहीं सोचती हो। माँ तुम ये सब कैसे कर लेती हो?
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