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कोरोना का कहर

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हमारा किया आज हमपे भारी पड़ रहा है,
कैद हुआ करते थे कभी पंछी,
आज हमें होना पड़ रहा है,
खेल ये कोई गलत नहीं है इस दुनिया का,
ये तो बस हमें अपने कर्मो का फल मिल रहा है।
आज देखो हालत इतने बत्तर हो गए है,
आटा- दाल चावल के लिए भी इंसान अब रो पड़े है,
नजाने अब और कब तक इस विपदा के तले रहना पड़ेगा,
नजाने अब और कितने दिन कोरोना के कहर में जीना पड़ेगा।
देश भर में फैली ये ऐसे महामारी है,
नज़ाने अब और कितने बेगानाओ की मौत इसमें लिखी जनी है?
बेशक इतना खौफ है चारों तरफ ,
की इंसान अब एक दूसरे के पास आने से भी घबराए।
अब भी अगर आंखें बंद और दिमाग को ताला रहेगा ,
तो रब जाने हमें इस कहर से कौन बचाएगा?
अब भी नहीं सुधरे तो सुधरने के लिए वक़्त ही नहीं बचा पाएंगे,
कोरोना के कहर से फिर जल्द नहीं उभर पाएंगे।
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