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कोविड 19, ये एकांत वास

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Part 1
ये एकांतवास सबको कुछ सीखा जाएगा,
बेगाने से लगने लगे उन अपनों को फिर अपना बना जाएगा।
घर पर रहकर सूनी दीवारों से बात करती वो माँ,
आज खुश है,
क्योंकि उसका वही बेटा पास है,
जिसके समय की हमेशा दरकार किया करती थी वो माँ।
तुम घर पर ही तो रहती हो,
दो रोटी ही तो बनाती हो,
कितना समय फोन पर बिताती हो,
इतने से काम से कैसे थक जाती हो।

ऐसे कितने ही तीखे तंज सुनती,
वो पत्नी भी इस एकांतवास से खुश है,
खुश है, क्योंकि उसका पति यह देख पा रहा है,
की वो कहाँ अपना वक़्त बिताती है,
छोटे-छोटे लगने वाले उन कामों को,
करते हुए कैसे वो थककर चूर हो जाती है।
एक गिलास पानी भी जो मांग कर पीता था,
आज वो चाय पिला रहा है,
यह एकांतवास उन प्यार भरे लम्हों को,
फिर वापस ला रहा है।
विपदा आई है, पर टल ही जाएगी,
जब सुकून क्षण-भंगूर है, तो ये कहाँ टिक पाएगी,
ठहरा हुआ वक़्त, थमी हुई सड़के,
फिर से कुछ याद दिलाएगी,
बीते हुए दिनों को,
दिल की दीवारों से टकराएगी।
Part 2
दूसरों से सोशल होने के चक्कर में,
हम घर में ही एंटी-सोशल हो गए,
आस-पास की कोई खबर ही नहीं,
हम ऐसे कैसे ग्लोबल हो गए,
फेसबुक, व्हाट्सएप्प और इंस्टा की नकली दुनिया में जीते हुए,
यह मान बैठे की हम इम्मोर्टल हो गए।
जीवन में न स्टॉप, पॉज और न ही रिवाइंड का बटन है,
फिर भी क्यों सब सिर्फ, दिखावे के जीवन में ही मगन है,
आज घर में सोफे के कोने में बैठे-बैठे यही विचार आया,
इस नकली दुनिया को जीते-जीते, मैं अपनी असली दुनिया कहीं छोड़ आया,
पैसा मैंने बहुत कमाया, इज्जत और शोहरत की भी कमी नहीं,
पर इन चार दीवारों के अंदर बैठे जो लोग हैं, क्या मुझे इनसे मोहब्बत नहीं।
जब सब लॉक डाऊन है तो यही मेरे साथ हैं,
बेचैनी के लम्हों में इन्ही का, मेरे हाथों में हाथ है,
एक ही पल में सब ठहर गया, कब तक ठहरेगा पता नहीं,
पर जो भाव ये एकांतवास जगा जायेगा, वो अब मेरे जीवन से मिटेगा नहीं।
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