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बेकाबू

बेकाबू

ना जाने कई बार मन इतना बेकाबू क्यों हो जाता है।
कुछ सही करने की जगह कुछ गलत कर जाता है।
जब समझाता है कोई हमे की सब्र करो सब अच्छा होगा।
ना जाने फिर क्यों ये बेकाबू होकर उम्मीद खो देता है।
ज़िन्दगी में उतार चढ़ाव तो हर मोड़ पर आते रहते है।
फिर क्यों ये उन परिस्थियों से घबराते रहते है।
समय हमेशा अपनी करवट बदलता रहता है।
हर मोड़ पर हमे नई चुनोतियाँ देता रहता है।
फिर क्यों हम उन चुनोतियो को स्वीकार करने से डरते है।
अपने मन को बेकाबू कर सोच समझकर काम नही करते है।
जब मालूम है हमे आज वक़्त बुरा है तो अच्छा भी आएगा।
फिर क्यों हम उस वक़्त में हार मानकर उम्मीद छोड़ते है।
अच्छे वक़्त में जब हम उन रास्तो पर चलते रहते है।
तो थोड़ा सा अंधेरा देखकर हम भागने क्यों लगते है।
ज़िन्दगी के सफर में सुख और दुख तो निरंतर मिलेंगे।
ये हमे तय करना है कि हम बेकाबू ना होकर कब तक चलेंगे।।
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