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चाय

चाय

हो सावन की मीठी फुहार,
मंद मंद चले ठंडी ब्यार।
साथ में हो अपना परिवार,
व सामने हो सुबह का अखबार।
हाथ में हो प्याला चाय का,
सोच कर ही आ जाता है मुंह में ज़ायका चाय का।
चाय हो अदरक वाली,
या हो इलायची डली।
चाय हो ग़र मसालेदार,
तो महक से ही उसकी,
आ जाये बहार।
चाय मेरे हर मूड की साथी है,
इसीलिए तो यह मुझे इतना भाती है।
पीते ही एक घूंट इसका,
छा जाता है हल्का हल्का सा सुरूर।
थकान से उतरे चेहरे पर भी,
छाने लगता है एक खुशनुमा नूर।
उदास हो मन अगर,
चाय ही उसे बहलाती है।
खुश हो यदि दिल तो,
चाय ही संग जश्न मनाती है।
काम का हो ग़र बोझ,
तो वह भी बंटाती है चाय।
कुछ करने का मन ना हो,
तो भी साथ देती है चाय।
इसीलिए तो मुझे,
इतना भाती है चाय।
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