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एहसास-ए-शिद्दत

एहसास-ए-शिद्दत

हुई है आज एहसास-ए-शिद्दत की रवानी
हुई है ख़्वाहिश भी आज-जानी पहचानी,
          भर कर तुम्हें बाहों में चूमते रहें हम यूँही
          ये हक़ीक़त हो ना हो एहसास-ए-ख़्याली,
सांसे तुम्हारी फिर मेरी सांसों में उलझें जो
दिल की बात हो, ना हो कोई बात दिमागी,
          मिलो ना कभी तन्हा, खो जाएं आबशारों में
          ढूंढते रहना, ये जो बरखा बरसी है दीवानी,
हायिल जो है पर्दा दरम्यान में तेरे–मेरे जो
हटा दो आज तुम होना है हमें फिर रूमानी,
         है जो मुहब्बत तुम्हें कैसे दिखाएँ *जान-ए-हैदर*
         तुम आए नहीं सामने जो है बात तुमसे ही बतानी,
आओ जो कभी तो आना साथ भरी बज़्म में
रश्क़ करें, फिर जाए सबकी उम्मीदों पे पानी,
       सब–कुछ ज़ाहिर कर दिया अपना हाल-ए-दिल
       अब हम में तुम ना हो तो बेकार है, है ये इश्क़ फ़ानी।
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