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दास्तान-ए-इश्क़

दास्तान-ए-इश्क़

मेरे ज़ख़्मो की इंतहा क्या कहिये
मरीज-ए-इश्क़ की दवा क्या कहिए।
रूबरू के मुस्तहिक़ है, ये दिल मेरा
नज़रें मिली भी नहीं, के झुकने का सिलसिला कहिये।
लबों पे आह भी, न ले पाती है ये दर्द
जैसे सर्द रातों, के बाद हल्का सवेरा कहिये।
गिरेबाँ चाक लिए, घूमते हैं दर बदर
मौत मिले न मिले पर ज़िन्दगी एक सज़ा कहिये।
दर्द, सितम, तन्हाई और फिर ये हरा ज़ख़्म
जम गई हो खून, ज़ख़्म पे ऐसा ज़खीरा कहिये।
तलब जो उठती है, इस दिल में बे शुमार
लहरों में डूबा हुआ इसे सफीना कहिये।
उम्मीद का चिराग, लिए बैठे हैं नीलोफर
सिर्फ और सिर्फ उन्हें मेरे इश्क़ का वसीला कहिये।
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