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बेटी के बिना

बेटी के बिना

नाज़ुक सी परी,
दस्तूर-ए-दुनिया भी ग़ज़ब है, अजीब सी रिवायतों का खेल अजब है। कलेजे के टुकड़े को किसी के पास सौंप देने का दर्द एक पिता से बेहतर कौन समझ सकता है? यहाँ तुम्हे १० बजे भी माँ उठाती थी, तो कितने नखरे सुनाती थी आज तुम पूरा घर संभालती हो। एक चूड़ी की चोट पे पूरा घर सर पे उठा लेने वाली कितनी खामोशी से हर ग़म छुपा लेती हो।
एक बेटी से माँ बनने के सफर में हमेशा मुझे गौरान्वित महसूस कराया। हाँ पर आज भी मेरे घर का आंगन सुना लगता है, क्या तुम्हें मेरी याद नही आती? किलकारियाँ, चहकना, छोटी छोटी सी बातों पे नाराज़ हो जाना, आज भी ऐसा लगता है जैसे कल की ही बात हो। आज भी उस गुड़िया को मैंने सम्भाल कर रखा जिसके बिना तुम एक पल नहीं रह पाती थीं, क्या आज मेरी गुड़िया परायी हो गयी। एक पिता का घर कभी भी पराया नही होता बेटा। ये घर का आंगन कल भी तुम्हारा था और आज भी है। इसकी रौशनी सिर्फ तुमसे है, तुमसे है, तुमसे है।
बिन तेरे आज भी आँगन सुना है मेरा, चहकती थी जो चिड़िया वो सुना कर गयी घर मेरा । तुम्हे हर वो खुशियाँ मिले जिसकी चाहत तुम रखती हो।

बाबा
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