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अंत

अंत

जिसका आदि है उसका अंत भी ज़रूरी है,
आदि व अंत के मध्य में जीवन की ही दूरी है।
आदि के साथ अंत का नियम तो है अटूट,
कहा भी गया है कि मरना सच और जीना झूठ।

अंत शब्द यूँ तो लगता है,
निराशाजनक व दुःखदायी,
लेकिन पुरानी का अंत होते ही,
नयी वस्तु है जीवन में पाई।

इस ब्रह्मांड में हर चीज़ है,
परिवर्तनशील व अस्थायी,
नदियां भी कल-कल करती हुईं,
अंत में समुद्र में ही जाकर समाईं।

प्रतिदिन होता है सूर्योदय और
दिन का अंत होता है सूर्यास्त के साथ,
फिर रात्रि का आगमन होता है,
दिन भर के थके लोगों की विश्रांति के साथ।

रात्रि का अंत होते ही फिर आता है नया सवेरा,
नई उमंगों,नई आशाओं व नये सपनों के साथ,
रात हो या दिन सभी का,
सत्कार होता है स्वागत के साथ।

कोई उत्सव हो या प्रसंग,
उसका भी अंत अवश्यंभावी है,
क्योंकि एक का अंत
और दूसरे का आरंभ ही प्रभावी है।

कभी-कभी किसी प्रिय का अंत,
झकझोर जाता है ज़िंदगी,
ऐसा लगता है मानो किस्मत ने,
की यह कैसी दिल्लगी।

फिर धीरे-धीरे ,
समय लगाता है अपना मरहम,
मिटते जाते हैं शनैः शनैः सब भ्रम।
तकदीर का लिखा आज तक टला है कभी ?
अंत में तो एक दूसरे से बिछुड़ जाएंगे सभी।

अंत तो होता है इस काया का,
मरती नहीं कभी आत्मा,
जिसका नहीं है कोई आदि व अंत,
वह तो है केवल परमपिता परमात्मा।
8 Comments
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